कोई भी रचनाकार समय और इतिहास स्मृति के स्तर पर यानि की टाइम एंड मेमोरी के स्तर पर लिखता है...पर जिन स्मृतियों के सहारे हम किसी स्थान, व्यक्ति या उसके व्यक्तित्व के बारे में लिखते हैं, वो यहाँ शायद सबसे कम मेरे ही पास है...पुस्तक के लेखक, मेरे नाना जी (रमेश चन्द्र झा) की 1994 में जब मृत्यु हुई उस वक़्त मैं 8 साल का था...सुगौली के ऐतिहासिक महत्व से लेकर साहित्य और स्वाधीनता आन्दोलन में उसके योगदान के बारे में शुरुआती जानकारी के एकमात्र स्र्त्रोत नाना जी ही थे...बचपन को प्रभावित करनेवाले सबसे प्रमुख व्यक्ति या नायक...जब मैं उनके साथ कहीं बाहर निकलता और बाहर के लोग या उनके समकालीन उनका अभिवादन करते तो मैं भी अपने आपको महत्वपूर्ण समझने लगता...उनकी उपस्थिति किसी मिथक पुरुष की तरह लगती...क़िस्से-कहानियों से निकले किसी नायक सी...यथार्थवादी, बहादुर और बेखौफ...समय बीतने के साथ साथ वे न होते हुए भी प्रभावित करते चले गए...अगर आप लोगों ने “वन हंड्रेड इयर्स ऑफ सॉलिट्यूड” के मशहूर लेखक गाब्रिएल गार्सिया मार्क्वेज़ की चीज़े पढ़ीं हों, तो आप जानते होंगे कि मार्क्वेज़ किस कदर अपने नाना जी से प्रभावित था...और अपने क़िस्से-कहानियों में बार बार उन्हें लेकर आ जाता था... एक लगातार बनी रहने वाली कचोट के साथ अब मैं ये सोचने को विवश हूँ कि जब नाना जी की मौत हुई तब मैं आठ साल का था और मुझे इस बात का बिलकुल एहसास नहीं था कि वो कौन थे और उनका जीवन कितना महत्वपूर्ण था. मैं उनसे क्या क्या बातें कर सकता था...शायद उनकी स्मृतियाँ उनके साथ ही चलीं गईं...
सहारनपुर, उत्तर प्रदेश के कन्हैया लाल मिश्र “प्रभाकर” जो ख़ुद तब के स्वतंत्रता सेनानी थे और जिन्होंने “नया जीवन” और “विकास” नाम की साहित्यिक और राष्ट्रीय पत्रिका का प्रकाशन और सम्पादन किया था, उन्होंने नाना जी के बारे में एक जगह लिखा है- “ रमेश चन्द्र झा और उनके परिवार का इतिहास स्वतंत्रता संग्राम में बर्बाद होकर अट्टाहास करने का इतिहास है....वे उनमें है, जिन्होंने गुलामी की बेड़ियाँ तोड़ने को स्वयं हथकड़ियाँ पहनी हैं और खौफ़नाक फ़रारी ज़िंदगी का लुत्फ़ भी उठाया है...वे उनमें हैं, जिन्होंने स्वतंत्रता पाई नहीं कमाई है और वे उनमें हैं जो स्वतंत्रता के लिए जान की बाज़ी लगा सकते हैं...”
सहारनपुर, उत्तर प्रदेश के कन्हैया लाल मिश्र “प्रभाकर” जो ख़ुद तब के स्वतंत्रता सेनानी थे और जिन्होंने “नया जीवन” और “विकास” नाम की साहित्यिक और राष्ट्रीय पत्रिका का प्रकाशन और सम्पादन किया था, उन्होंने नाना जी के बारे में एक जगह लिखा है- “ रमेश चन्द्र झा और उनके परिवार का इतिहास स्वतंत्रता संग्राम में बर्बाद होकर अट्टाहास करने का इतिहास है....वे उनमें है, जिन्होंने गुलामी की बेड़ियाँ तोड़ने को स्वयं हथकड़ियाँ पहनी हैं और खौफ़नाक फ़रारी ज़िंदगी का लुत्फ़ भी उठाया है...वे उनमें हैं, जिन्होंने स्वतंत्रता पाई नहीं कमाई है और वे उनमें हैं जो स्वतंत्रता के लिए जान की बाज़ी लगा सकते हैं...”
मामा
जी (विनायक झा) जब जीवित थे तब एक बार उन्होंने बताया था कि नाना की मृत्यु पर दान
में हमें साहित्यकारों के पत्र और कुछ किताबें दी गईं थी...जैसा की आमतौर पर मृतक
की प्रिय वस्तुयों को दान देने का रिवाज़ है...तब मैं इतना
छोटा और नासमझ था कि उन
पत्रों को साधारण कार्ड समझकर उससे खेलता था, शायद मैंने कुछ खो भी दिए हों...पर
कुछ को बचाए भी रखा...अब जब उन पुराने ज़र्द पीले पड़ चुके पत्रों को देखता हूँ तो
पता चलता है कि ये पत्र हरिवश राय बच्चन, रामवृक्ष बेनीपुरी, शिवपूजन सहाय, आरसी
प्रसाद सिंह जैसों रचनाकारों के हैं और जिनका अपना महत्व है...”स्वाधीनता समर में
: सुगौली” पुस्तक भी मेरे पास दान में ही आई थी...और अब 35 वर्षों बाद
जब इसका पुनर्प्रकाशन हो रहा है तब लग रहा है शायद सुगौली का समृद्ध इतिहास, उसकी
संस्कृति और वहां का साहित्य धरोहर के तौर पर दान में “ट्रांसफ़र” किया गया था...
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| (यह लेख "स्वाधीनता समर में सुगौली" कृति से साभार लिया गया है) |
1857 से लेकर 1947 तक का 90 वर्षों का
सुगौली का इतिहास देश को ग़ुलाम बनाने वाली ब्रिटिश सरकार से लगातार संघर्ष करने का
इतिहास है...जो क्षेत्रीय स्तर पर लड़ा जाता हुआ राष्ट्रीय स्तर से मिलकर एक होता
रहा...
1857 के दौर वाले सुगौली-छावनी के ऐतिहासिक क़िस्से तो अब लोक-कथा जैसे लगने लगे हैं, जिसमें छावनी के 12 नंबर देशी रिसाले के बहादुर सिपाहियों ने अपनी जान देकर स्वाधीनता-संघर्ष की आग को पुरे चम्पारण तक फ़ैला दिया...और आने वाली पीढ़ी के लिए प्रेरणा-स्त्रोत बने...कहते हैं कि सुगौली छावनी के एक साहसी सैनिक दलेल खां ने अपने साथियों के साथ मिलकर मिस्टर गार्नर नाम के एक तानाशाह और वहशी अँगरेज़ का क़त्ल कर दिया था...और फ़रार होकर नेपाल में छुप गए थे...वे फ़कीरों के भेष में लंबे समय तक नेपाल में ही रहे...लेकिन जब लौटकर सुगौली आये तो किसी ने मुखबिरी कर दी और उन्हें पकड़कर फाँसी दे दी गई... इतिहास जब लोक-कथा जिसे अंग्रेज़ी में हम फ़ोक-टेल कहते हैं में बदल जाये तो उसके स्थायी और रोचक होने की गुंजाईश बढ़ जाती है...तब वह सिर्फ़ दस्तावेज़ी न रहकर, दास्तानों में बदल जाता है...पुरी सबऑल्टन थ्योरी यहीं कहती है और इसी पॉइंट पर मेनस्ट्रीम इतिहास और इतिहासकार से टकराती है... तो अगर दस्तावेज़ों और दास्तानों की मानें तो सुगौली ने बहुत कुछ देखा, भोगा और सहा है...यह युद्ध-स्थल भी है और संधि-स्थल भी... काशी प्रसाद श्रीवास्तव की किताब “नेपाल की कहानी” और नेपाल के ही एक इतिहासकार एन. थापा की किताब “नेपाल का संक्षिप्त इतिहास” में सुगौली-संधि पर विस्तार के चर्चा की गई है. नेपाली खुखड़ी और अंग्रेज़ी तलवार की टकराहट के कारणों को लेकर एन. थापा ने लिखा है- “नेपाल के लोग ह्रदय से शांति चाहते थे और अंग्रेजों से युद्ध करने का उनका ख्याल नहीं था, किन्तु वे इस बिन्दु पर झुक भी नहीं सकते थे, क्युकि नेपाल और भारत की पाँच सौ मील लंबी सीमा पर अनेक ऐसे बिन्दु थे, जहाँ ऐसे विवाद उठ खड़े हुए थे...नेपाली जानते थे कि एक स्थान पर झुकने का मतलब है स्थिति को बदतर बनाना तथा अन्य स्थानों पर भी हक़ जताने के लिए अंग्रेजों को प्रोत्साहित करना...नेपाल ने अपने हक़ पर दृढ़ रहने का निश्चय किया और जब अंग्रेजों ने विवादास्पद क्षेत्रों को अपने अधिकार में कर लिया तो नेपाल ने अंग्रजों द्वारा स्थापित पुलिस-चौकियों पर प्रत्याक्रमण किया और खोयी हुई भूमि फिर से प्राप्त की...इसी के फ़लस्वरूप सन 1814 में अंग्रेजों और नेपालियों के बिच संघर्ष छिड़े....” इतिहासकार बी. एल. ग्रोवर अपनी किताब “आधुनिक भारतीय इतिहास” में सुगौली-संधि का ज़िक्र करते हुए लिखते हैं- “यह संधि-वार्ता कंपनी के सेनापति डेविड आक्टर लोनी द्वारा मकवानपुर नामक स्थान पर गोरखों की करारी हार के बाद चली...संधि की इच्छा दोनों ही पक्षों में थी क्योकिं दोनों एक-दुसरे की शक्ति से परिचित हो चुके थे...” इतिहास हमें बताता है कि अंग्रेजों और गोरखों के बिच जो ऐतिहासिक युद्ध हुआ, उसमें गोरखों ने अपने शौर्य संस्कार का अमिट इतिहास लिख दिया और इससे विश्व के सैनिक जगत में गोरखे प्रसिद्द हुए...
1920 के असहयोग आन्दोलन में अपने सर्वस्व की आहुति देने वालों में पंडित वैद्द्नाथ मिश्र (करमवा), श्री लक्ष्मीनारायण झा (बड़का बाबा, नाना जी के पिता), सुखम मिश्र, श्री रामावतार लाल, श्री गणेशप्रसाद साह (सुगौली) आदि के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं.
यह भी याद रखना ज़रूरी है कि नमक सत्याग्रह के मौके पर 15 अप्रैल 1930 को नमक कानून भंग करने के लिए जो जत्था मोतिहारी के बंजरिया पंडाल से चला था उसका नेतृत्व पुस्तक के लेखक के पिता श्री लक्ष्मीनारायण झा (फुलवरिया) और पंडित वैद्द्नाथ मिश्र ने किया और गिरफ़्तार कर लिए गए. इतने अलावा डुमरी के बालगोविन्द भगत, छगराहा के यामुनाकांत झा, बहुअरवा के जूठन गिरि, जैसे लोगों के ज़िक्र किताबों में भरे पड़े हैं...अंग्रेज़ों के काले कानूनों के विरुद्ध जिस तरह गाँधी ने स्वदेशी आन्दोलन के तहत चरखा और खादी का प्रचार किया उसी तरह नमक कानून को भंग करने के लिए नमक सत्याग्रह (1930) शुरू किया...महात्मा गाँधी ने अपने ऐतिहासिक बयान में कहा- “भारत का स्वाभिमान एक मुट्ठी नमक के भीतर सुरक्षित है, मुट्ठी भले ही टूट जाए पर खुले नहीं...ग्रामीण लोगों को भी नमक बनाने के लिए निकल आना चाहिए...”
चम्पारण के लिए नमक क़ानून भंग करने का दिन गाँधी के चम्पारण आगमन तिथि 15 अप्रैल 1930 को ही रखा गया...सुगौली के विश्वनाथ कुमार (लेखक-संस्थापक दीनदयाल बालिका उच्च विद्यालय) ने “सुगौली : तब और अब” (वासंती निलयम प्रकाशन : प्र. वर्ष 1986) नाम से जो किताब सम्पादित की है उसमें चम्पारण के प्रसिद्द साहित्यकार विन्ध्याचल प्रसाद गुप्त ने लिखा है कि फुलवरिया (सुगौली स्थित) गाँव के ही एक बगीचे में नमक कानून भंग किया गया...इस अवसर पर अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस कमिटी के महामंत्री आचार्य जे. बी. कृपलानी फुलवरिया आये और नमक सत्याग्रहियों को संबोधित किया...आज के ही दिन पंडित वैद्द्नाथ मिश्र (करमवा) और श्री लक्ष्मी नारायण झा (फुलवरिया) ने बंजरिया पंडाल (मोतिहारी) से चले नमक सत्याग्रहियों के जत्थे का नेतृत्व किया... वैद्द्नाथ मिश्र और लक्ष्मी नारायण झा दोनों गिरफ़्तार कर लिए गए और इन्हें 6 माह के लिए सश्रम कारावास की सज़ा देकर हजारीबाग सेन्ट्रल जेल भेज दिया गया...”
अपने आलेख में वे सुगौली ने लगभग हर कस्बे, मोहल्ले या गाँव के सत्याग्रहियों और आज़ादी के दीवानों का ज़िक्र करते हुए एक जगह और नाना जी और उनके परिवार के बारे में लिखते हैं कि असहयोग आन्दोनल से लेकर सन 1942 की महान अगस्त क्रांति के बिच जिन स्वतंत्रता सेनानी का घर सबसे ज्यादा लूटा गया है वो लक्ष्मीनारायण झा और उनके बेटे रमेश चन्द्र झा का ही है...
आज़ादी के बाद नाना ने राजनीति न चुनकर लेखन चुना था और एक स्वन्त्रत लेखक के रूप में हर विधा पर लगातार लिखते रहे...आज़ादी की लड़ाई में शामिल होने की वजह से घर को “लुटते” हुए देखना और सहना या फिर “फ़रारी ज़िंदगी” का लुत्फ़ उठाने को उन्होंने अपनी रचनाओं का आधार बनाया... तभी शायद वे लिख पाए थे- “जंगल झाड़ भरे खंडहर में सोया पाँव पसार / दलित ग़ुलाम देश का मारा हरा थका फ़रार”
जेल और गिरफ़्तारी के दिनों में नाना जी पढ़े लिखे विद्वान् सत्याग्रहियों के संपर्क में आये थे और उनकी संगती में पढ़ना शुरू किया...फिर धीरे-धीरे अपने गीतों को गुनगुनाना शुरू कर दिया था...ठीक वैसे ही जैसे विश्व विख्यात सिंगर बॉब मारले जेल के दिनों में लिखना-पढ़ना शुरू किया...जेल के कैदियों ने ही बॉब को बताया था कि वो लिखकर गा सकता है...फिर बाहर निकलकर बॉब ने लेखन और गायन में खुद को समर्पित कर दिया... वीर रस पर लिखते हुए नाना जी कभी दिनकर की परम्परा के कवि लगते हैं, तो कभी अपनी रुबाइयों की वजह से जॉन किट्स की तरह के. “दर्द मेरा तो दिल आपकी अमानत है/ आग मेरी है तो घर आपका सलामत है/ चार दिन चाँद का उम्र भर अँधेरे का/ प्यार सागर है मगर हुश्न भी क़यामत है” नाना जी विचारों, संस्कारों और अपने कार्यों से ठेंठ गांधीवादी थे और गाँधीवादी होने पर उन्हें स्वाभिमान भी था...आखिरी दिनों में उनके थके पैरों को दबाते हुए जब मैं उनकी ग़ज़लें और कवितायेँ गाकर सुनाता, तो वे बहुत खुश होते थे... “मोर चरखा के टूटे ना तार चरखवा चालू रहे / गांधी बाबा चललें दूल्हा बन के, दुल्हिन बनल सरकार चरखवा चालू रहे..” ये तब का गाया हुआ गीत मुझे याद रह गया...
यह भी याद रखना ज़रूरी है कि नमक सत्याग्रह के मौके पर 15 अप्रैल 1930 को नमक कानून भंग करने के लिए जो जत्था मोतिहारी के बंजरिया पंडाल से चला था उसका नेतृत्व पुस्तक के लेखक के पिता श्री लक्ष्मीनारायण झा (फुलवरिया) और पंडित वैद्द्नाथ मिश्र ने किया और गिरफ़्तार कर लिए गए. इतने अलावा डुमरी के बालगोविन्द भगत, छगराहा के यामुनाकांत झा, बहुअरवा के जूठन गिरि, जैसे लोगों के ज़िक्र किताबों में भरे पड़े हैं...अंग्रेज़ों के काले कानूनों के विरुद्ध जिस तरह गाँधी ने स्वदेशी आन्दोलन के तहत चरखा और खादी का प्रचार किया उसी तरह नमक कानून को भंग करने के लिए नमक सत्याग्रह (1930) शुरू किया...महात्मा गाँधी ने अपने ऐतिहासिक बयान में कहा- “भारत का स्वाभिमान एक मुट्ठी नमक के भीतर सुरक्षित है, मुट्ठी भले ही टूट जाए पर खुले नहीं...ग्रामीण लोगों को भी नमक बनाने के लिए निकल आना चाहिए...”
चम्पारण के लिए नमक क़ानून भंग करने का दिन गाँधी के चम्पारण आगमन तिथि 15 अप्रैल 1930 को ही रखा गया...सुगौली के विश्वनाथ कुमार (लेखक-संस्थापक दीनदयाल बालिका उच्च विद्यालय) ने “सुगौली : तब और अब” (वासंती निलयम प्रकाशन : प्र. वर्ष 1986) नाम से जो किताब सम्पादित की है उसमें चम्पारण के प्रसिद्द साहित्यकार विन्ध्याचल प्रसाद गुप्त ने लिखा है कि फुलवरिया (सुगौली स्थित) गाँव के ही एक बगीचे में नमक कानून भंग किया गया...इस अवसर पर अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस कमिटी के महामंत्री आचार्य जे. बी. कृपलानी फुलवरिया आये और नमक सत्याग्रहियों को संबोधित किया...आज के ही दिन पंडित वैद्द्नाथ मिश्र (करमवा) और श्री लक्ष्मी नारायण झा (फुलवरिया) ने बंजरिया पंडाल (मोतिहारी) से चले नमक सत्याग्रहियों के जत्थे का नेतृत्व किया... वैद्द्नाथ मिश्र और लक्ष्मी नारायण झा दोनों गिरफ़्तार कर लिए गए और इन्हें 6 माह के लिए सश्रम कारावास की सज़ा देकर हजारीबाग सेन्ट्रल जेल भेज दिया गया...”
अपने आलेख में वे सुगौली ने लगभग हर कस्बे, मोहल्ले या गाँव के सत्याग्रहियों और आज़ादी के दीवानों का ज़िक्र करते हुए एक जगह और नाना जी और उनके परिवार के बारे में लिखते हैं कि असहयोग आन्दोनल से लेकर सन 1942 की महान अगस्त क्रांति के बिच जिन स्वतंत्रता सेनानी का घर सबसे ज्यादा लूटा गया है वो लक्ष्मीनारायण झा और उनके बेटे रमेश चन्द्र झा का ही है...
आज़ादी के बाद नाना ने राजनीति न चुनकर लेखन चुना था और एक स्वन्त्रत लेखक के रूप में हर विधा पर लगातार लिखते रहे...आज़ादी की लड़ाई में शामिल होने की वजह से घर को “लुटते” हुए देखना और सहना या फिर “फ़रारी ज़िंदगी” का लुत्फ़ उठाने को उन्होंने अपनी रचनाओं का आधार बनाया... तभी शायद वे लिख पाए थे- “जंगल झाड़ भरे खंडहर में सोया पाँव पसार / दलित ग़ुलाम देश का मारा हरा थका फ़रार”
जेल और गिरफ़्तारी के दिनों में नाना जी पढ़े लिखे विद्वान् सत्याग्रहियों के संपर्क में आये थे और उनकी संगती में पढ़ना शुरू किया...फिर धीरे-धीरे अपने गीतों को गुनगुनाना शुरू कर दिया था...ठीक वैसे ही जैसे विश्व विख्यात सिंगर बॉब मारले जेल के दिनों में लिखना-पढ़ना शुरू किया...जेल के कैदियों ने ही बॉब को बताया था कि वो लिखकर गा सकता है...फिर बाहर निकलकर बॉब ने लेखन और गायन में खुद को समर्पित कर दिया... वीर रस पर लिखते हुए नाना जी कभी दिनकर की परम्परा के कवि लगते हैं, तो कभी अपनी रुबाइयों की वजह से जॉन किट्स की तरह के. “दर्द मेरा तो दिल आपकी अमानत है/ आग मेरी है तो घर आपका सलामत है/ चार दिन चाँद का उम्र भर अँधेरे का/ प्यार सागर है मगर हुश्न भी क़यामत है” नाना जी विचारों, संस्कारों और अपने कार्यों से ठेंठ गांधीवादी थे और गाँधीवादी होने पर उन्हें स्वाभिमान भी था...आखिरी दिनों में उनके थके पैरों को दबाते हुए जब मैं उनकी ग़ज़लें और कवितायेँ गाकर सुनाता, तो वे बहुत खुश होते थे... “मोर चरखा के टूटे ना तार चरखवा चालू रहे / गांधी बाबा चललें दूल्हा बन के, दुल्हिन बनल सरकार चरखवा चालू रहे..” ये तब का गाया हुआ गीत मुझे याद रह गया...
उनके लिए कांग्रेस “पॉलिटिक्स” नहीं था शायद...अंग्रेज़ी हुकूमत के खिलाफ़ “प्रोटेस्ट” था... उन्होंने कहीं लिखा भी है कि आज़ादी के बाद बहुत से सेनानी राजनीतिक कार्यकर्ता हो गए पर मुझे यह स्वीकार न हुआ... “प्रतीत आकुल आत्मा की साधना है / साधना जीवित कला है कल्पना है...मौन गहरी थे मेरे साथ लेकिन / यह अंधेरी रात है कुहरा घना है....मूलधन सम्पूर्ण जीवन ग्रन्थ मेरा / और जो बाकी बचा प्रस्तावना है...राग दरबारी कभी गाने न आया / साथ मेरे आपकी संवेदना है...”
“स्वाधीनता समर में : सुगौली” चुकी उन्होंने खुद लिखी है या ऐसी और भी कई शोध-परक किताबें...जिसमें उन्होंने अपने समय और समकालीनों की खोज-खबर लेना ज्यादा मुनासिब समझा है और इस वजह से भी वे अपने जीवन और साहित्य पर चर्चा नहीं कर पाए हैं... पर जैसा कि विश्व के मशहूर पेंटर वॉन-गॉग के साथ हुआ...अगर उनकी ननद (सिस्टर-इन-लौ) जोहन्ना वॉन गॉग उनकी पेंटिंग्स को दुनियां के सामने लेकर नहीं आई होती, तो शायद आज हम विश्व के कुछ उत्कृष्ट कला-कृतियों से महरूम रह गए होते... हम अपने रचनाकारों को आलोचकों की वजह से ही जान पाते हैं.... ठीक वैसे ही इतिहासकार हमें बताते हैं कि हमारे देश में किस-किस नाम के कौन महान व्यक्तित्व हुए... जब हमें कोई बताता है कि एथेंस (ग्रीक) में अखेलिस नाम का कोई महान योद्धा हुआ करता था तभी हम जान पाते हैं...हमारी ख़ुद की कोई नज़र नहीं होती, कोई बोध नहीं होता, कोई ज़िम्मेदारी नहीं होती...और इस वजह से कितने महान व्यक्तित्व के जीवन और उनके काम से हम महरूम रह जाते हैं...उनके योगदान, त्याग और बलिदान से अनभिज्ञ रह जाते हैं...हमें याद रखना है कि किसी भी क्षेत्र और उसके निवासियों के लिए उनका इतिहास और उनका अतीत उनके गर्व और गौरव की गाथा हुआ करती है...और उस विरासत को किसी इतिहासकार और आलोचक के भरोसे छोड़ देना, अपने उत्तरदायित्व से भागना है.
सुगौली के समृद्ध इतिहास और यहाँ के “नायकों” के प्रति हमें सजग और सचेत रहना है...इस तरह से किसी भी राज्य और देश का इतिहास ख़ुद-ब-ख़ुद तैयार हो सकता है...
“स्वाधीनता समर में : सुगौली” चुकी उन्होंने खुद लिखी है या ऐसी और भी कई शोध-परक किताबें...जिसमें उन्होंने अपने समय और समकालीनों की खोज-खबर लेना ज्यादा मुनासिब समझा है और इस वजह से भी वे अपने जीवन और साहित्य पर चर्चा नहीं कर पाए हैं... पर जैसा कि विश्व के मशहूर पेंटर वॉन-गॉग के साथ हुआ...अगर उनकी ननद (सिस्टर-इन-लौ) जोहन्ना वॉन गॉग उनकी पेंटिंग्स को दुनियां के सामने लेकर नहीं आई होती, तो शायद आज हम विश्व के कुछ उत्कृष्ट कला-कृतियों से महरूम रह गए होते... हम अपने रचनाकारों को आलोचकों की वजह से ही जान पाते हैं.... ठीक वैसे ही इतिहासकार हमें बताते हैं कि हमारे देश में किस-किस नाम के कौन महान व्यक्तित्व हुए... जब हमें कोई बताता है कि एथेंस (ग्रीक) में अखेलिस नाम का कोई महान योद्धा हुआ करता था तभी हम जान पाते हैं...हमारी ख़ुद की कोई नज़र नहीं होती, कोई बोध नहीं होता, कोई ज़िम्मेदारी नहीं होती...और इस वजह से कितने महान व्यक्तित्व के जीवन और उनके काम से हम महरूम रह जाते हैं...उनके योगदान, त्याग और बलिदान से अनभिज्ञ रह जाते हैं...हमें याद रखना है कि किसी भी क्षेत्र और उसके निवासियों के लिए उनका इतिहास और उनका अतीत उनके गर्व और गौरव की गाथा हुआ करती है...और उस विरासत को किसी इतिहासकार और आलोचक के भरोसे छोड़ देना, अपने उत्तरदायित्व से भागना है.
सुगौली के समृद्ध इतिहास और यहाँ के “नायकों” के प्रति हमें सजग और सचेत रहना है...इस तरह से किसी भी राज्य और देश का इतिहास ख़ुद-ब-ख़ुद तैयार हो सकता है...
संजीव के झा
12 फरवरी, 2016
वेर्सोवा, मुंबई

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