सुगौली में स्वतंत्रता सेनानियों का एक
लंबा और व्यवस्थित संगठन था. जिनके बल पर आज़ादी की लंबी लड़ाई संभव हुई. लेकिन सुगौली के स्वतंत्रता सेनानियों में कुछ लोग ऐसे थे जिनका पूरा परिवार ही
स्वतंत्रता संग्राम के मोर्चे पर झुझता रहा. ऐसे परिवारों में पंडित बाबूलाल मिश्र
(करमवा), आसमन महतो (श्रीपुर) के साथ ही लक्ष्मीनारायण झा (फुलवरिया) का नाम और उनका
योगदान स्मरणीय और उल्लेखनीय है.
स्वतंत्रता संग्राम में सुगौली
प्रखंड के योगदान की चर्चा
होते ही फुलवरिया के लक्ष्मीनारायण झा और उनके परिवार का ज़िक्र करना महत्वपूर्ण हो
जाता है. आज़ादी की लड़ाई में इस परिवार की भूमिका से राष्ट्रीय स्तर पर चल रहे
तात्कालीन वातावरण को गाँवों और कस्बों के स्तर पर देखा और समझा जा सकता है.
सुगौली और चम्पारण के इस परिवार के बारे
में यूँ तो इतिहास और साहित्य की कुछेक किताबों में ज़िक्र मिलता है, पर सही ढंग से
किसी ने विस्तृत जानकारी नहीं दी है. जबकि इस परिवार और परिवार के सदस्यों के
त्याग-बलिदान और योगदान पर एक पुरी किताब लिखी जा सकती है. इस अवसर पर सबसे पहले सेनानी
लक्ष्मीनारायण झा का नाम बरबस ही याद आता है, जो अपने परिवार में न सिर्फ़ बड़े थे
बल्कि जिन्होंने आज़ादी की लड़ाई में अच्छा-खासा योगदान दिया.
यूँ तो सुगौली 1857 के सिपाही विद्रोह से
ही एक्टिव था, पर असहयोग आन्दोलन के समय सुगौली का सबसे प्रखर राजनीतिक रूप
उभर कर सामने आया. सविनय अवज्ञा घोषित होते ही लक्ष्मीनारायण झा आज़ादी की लड़ाई में
कूद पड़े. तब के समय के हेकौक अकादमी (आज का गोपाल साह विद्यालय) मोतिहारी के छात्र
लक्ष्मीनारायण झा ने सरकारी स्कूल छोड़कर, राष्ट्रीय विद्यालय मोतिहारी में अपना
नामांकन करवाया. उनके इस कदम ने क्रांति पैदा कर दी. इसके बाद तो कई सत्याग्रहियों
और देशभक्तों ने भी सरकारी आदर्श स्कूल, बेतिया को छोड़कर राष्ट्रीय विद्यालय
बेतिया में नामांकन करवाया. यह वही राष्ट्रीय विद्यालय है जिसकी स्थापना प्रजापति
मिश्र (रानीपुर, बेतिया) के सहयोग से हुई थी और जो राष्ट्रीयता के उद्देश्य से
स्थापित किया गया था.
लक्ष्मीनारायण झा द्वारा इस स्कूल में नामांकन लेने के
फैसले ने सुगौली के ही नहीं बल्कि पुरे चम्पारण के सैकड़ों छात्रों को नई ऊर्जा और
दिशा दी. बड़ी संख्या में छात्रों ने सरकारी स्कूलों का बहिष्कार किया और राष्ट्रीय
स्कूलों में पढ़ने लगे. गौरतलब है कि ये राष्ट्रीय विद्यालय मेधावी छात्र ही नहीं
साहसी स्वतंत्रता सेनानी भी पैदा कर रहे थे.
असहयोग आन्दोलन के समय हिंदी प्रचारक पुस्तकालय (फुलवरिया)
की स्थापना सन 1921 को हुई. इसकी मूल प्रेरणा भी लक्ष्मीनारायण झा से ही मिली थी.
यह पुस्तकालय फुलवरिया के ही जगीदत्त झा के घर के बाहर एक
झोपडी में शुरू किया गया. पर सबसे रोचक और मज़ेदार क़िस्सा है इस पुस्तकालय के चलाये
जाने यानि कि फंडिंग का. दरअसल इस पुस्तकालय का जन्म एक मुट्ठी चावल (मुठिया) के
बल पर हुआ. फुलवरिया गाँव के अमूमन हर संपन्न परिवार की औरतें रोज़ाना नियमपूर्वक
एक मुट्ठी चावल निकाल कर मिटटी के बर्तन में रख दिया करतीं और फिर हफ़्ते दिन बाद
मुठिया का संग्रह कर लिया जाता और बेंचकर थोड़े पैसे जमा हो जाते. मुठिया का चावल
बेंचकर बहुत सारा साहित्य खरीदा जाता और राष्ट्रीयता की प्रेरणा ली जाती. लाइब्रेरी
चलाने का यह मज़ेदार कांसेप्ट भी लक्ष्मीनारायण झा का ही था. यही मुठिया प्रथा बाद
में स्वतंत्रता आन्दोलन के समय प्रचलित हो गई और चम्पारण के कई जगहों पर ऐसे
पुस्तकालय खोले जाने लगे. वैसे तो हिन्दी प्रचारक पुस्तकालय हिन्दी के
प्रचार-प्रसार के लिए स्थापित किया गया था, पर लक्ष्मीनारायण झा के प्रयासों से वह
राष्ट्रीय जागरण के बीज बिखेरता रहा. यह पुस्तकालय सुगौली के स्वतंत्रता-समर का
सूत्रधार भी कहा जाता है.
हिन्दी प्रचारक पुस्तकालय, फुलवरिया की ओर से आयोजित
चम्पारण जिला हिन्दी साहित्य सम्मलेन के एक अधिवेशन (सन 1929) के युवक सम्मलेन का
संचालन रामवृक्ष बेनीपुरी ने किया था. वहीँ रामवृक्ष बेनीपुरी जिन्हें कलम की
दुनिया के जादूगर कहा गया है. तब वे भी स्वाधीनता संग्राम में शामिल एक सच्चे
देशभक्त थे. इस अधिवेशन में अस्पृश्यता निवारण पर लम्बी चर्चा हुई. युवक सम्मेलन
के दुसरे दिन बेनीपुरी जी लक्ष्मीनारायण झा के घर उनके कुआँ पर जब स्नान करने गए
(तब वे वहीँ रुके थे) तो एक हरिजन ने आकर उन्हें टोका, “सरकार, छुआ-छूत भगाने
की बात तो की जाती है पर वो सिर्फ बात भर है” इस पर बेनीपुरी जी ने कहा, “क्या
तुम हरिजन हो...? चलो पानी चलाओ, आज तुम्हारा पानी चला दिया जाये...” महंगू
दुसाध पानी भरने लगा और बेनीपुरी जी नहाने लगे. जब पानी चलाते चलाते महंगू का दम
चढ़ गया तो बेनीपुरी जी बोले, “अभी तुम्हारा पानी चला नहीं, थोड़ा और चलाओ..”
महंगू वहां से भाग खड़ा हुआ और कुछ इस तरह लक्ष्मीनारायण झा के दरवाजे पर से
बेनीपुरी जी ने फुलवरिया के हरिजन का पानी चलाया. यह घटना तब की है जब छुआछुत
मिटाने की बात की जाती थी, पर इसके लिए बहुत कम ही लोग सामने आते थे. यह समय था
असयोग आन्दोलन का जो गंभीर रूप धारण करता जा रहा था.
पुस्तकालयों की स्थापना, साहित्य सम्मलेनों और अधिवेषनों ने
जनता को विचार के स्तर पर प्रभावित और उद्वेलित किया. सन 1926
के आसपास तो अंग्रेज बजाप्ता ऐसे पुस्तकालयों को खोज खोज कर
उन्हें तबाह करने लगे और न जाने कितने दुर्लभ और आवश्यक किताबें उठाकर ले गए और जला
दिया. श्री रामधारी प्रसाद विशारद (अध्यक्ष, बिहार हिन्दी साहित्य सम्मलेन) की
प्रेरणा से हिन्दी साहित्य सम्मलेन प्रयाग का प्रथमा और विशारद की परीक्षा केंद्र
स्थापित किया गया. लक्ष्मीनारायण झा परीक्षा केंद्र के अध्यक्ष मनोनीत किये गए. वे
खुद हिन्दी और इतिहास भी पढ़ाया करते थे. यह केंद्र भी छात्रों में देश-प्रेम और
राष्ट्रीयता की भावना भरने में कामयाब रही.
सुगौली कांग्रेस कमिटी की ओर से अस्पृश्यता निवारण के चलते
लक्ष्मीनारायण झा और वैद्यनाथ मिश्र जैसे कई वरिष्ठ सत्याग्रही समाज से बहिष्कृत
किये गए.
इतना ही नहीं, प्रजापति मिश्र जो “बिहार गांधी सेवा संघ” के
सदस्य और स्वाधीनता समर के साहसी योद्धा थे और साथ की साथ गाँधी आश्रम से सम्बद्ध
थे, जिसका उद्देश्य था स्वदेशी प्रचार, ग्रामीण उद्योग का विकास, खादी का विकास और
राष्ट्रीय जागरण. उस आश्रम को विकसित करने का श्रेय भी वरिष्ठ स्वतंत्रता सेनानी
लक्ष्मीनारायण झा को जाता है. पर दुर्भाग्य से यह आश्रम असमय ही शासन की दमन नीति
का शिकार हो गया. सन 1932 में जब कांग्रेस गैरक़ानूनी घोषित हुई, यहाँ के लगभग
प्रायः सभी वरिष्ठ नेता जेल के भीतर कर दिए गए. उसके बाद अंग्रेजी सरकार ने इस
आश्रम को लूट लिया. ऐसे कई आश्रमों की स्थापना और उसके सफल संचालन का श्रेय
प्रजापति मिश्र और लक्ष्मीनारायण झा को जाता है जिनकी वजह से सुगौली और चम्पारण
में आज़ादी की लड़ाई को आधार और नेतृत्व मिल सका.
स्वाभाविक था कि लक्ष्मी झा अंग्रेजों की आखों की किरकिरी
बनते जा रहे थे. चम्पारण के अंग्रेज़ी अफसर सोच में पड़ गए और फिर शुरू हुआ दमन का
दौर. कई संगीन जुर्म के आरोपी बनाकर उन्हें कोर्ट में घसीटा गया और जुर्माने की
रकम नहीं अदा करने के कारण और कुछ अन्य अभियोग लगाकर न सिर्फ़ इन्हें गिरफ़्तार कर
लिया गया बल्कि गुस्साए हुए अंग्रेजों ने इनका पूरा घर लूट लिया. लेकिन लक्ष्मी झा
कभी अपने पथ से विचलित नहीं हुए. दमन की इन आग भरी घड़ियों में भी आज़ादी पाने के
लिए लगातार संघर्ष करते रहे. इतिहास पर गौर करें तो पाएंगे कि सुगौली की जनता, यहाँ के लोग कभी तमाशबीन नहीं रहे. उन्होंने समय-समय पर
प्रतिरोध किया और शौर्य गाथाएं लिखीं. इस सत्य और गौरव कथाओं की कड़ियाँ आज भी नई
पीढ़ी को प्रेरित करती हैं.
1942 के ‘अगस्त क्रांति’ जिसे ‘हम भारत छोड़ो आन्दोलन’ के
नाम से भी जानते हैं कि घोषणा हो चुकी थी. ‘क्रिप्स मिशन’ की विफ़लता के बाद
महात्मा गाँधी ने ब्रिटिश शासन के खिलाफ़ अपना तीसरा बड़ा आंदोलन छेड़ने का फ़ैसला
लिया. 8 अगस्त 1942 की शाम को बम्बई में अखिल भारतीय काँगेस कमेटी के बम्बई सत्र
में 'अंग्रेजों भारत छोड़ो' का नारा बुलंद हुआ. हालांकि
गाँधी जी को फ़ौरन गिरफ़्तार कर लिया गया था लेकिन देश भर के युवा कार्यकर्ता
गाँधी के कहे मुताबिक अपने अपने स्तर पर आज़ादी पाने में जी जान से जुट गए.
लक्ष्मीनारायण झा के भाई राजाजी झा और सुखम मिश्र अपने अपने
स्तर पर लगे हुए थे. लेकिन घर के सिर्फ बड़े सदस्य ही नहीं 14 साल के उनके बेटे पर
भी अपने परिवार और तात्कालीन वातावरण का प्रवाभ पड़े बिना नहीं रह सका. 1942 के समय
लक्ष्मीनारायण झा के बेटे रमेशचन्द्र झा (लेखक “स्वाधीनता समर में : सुगौली”) की
उम्र महज़ 14 बरस थी. पर हौसला था जल्द से जल्द आज़ादी पाने का. आज़ादी की लड़ाई में
इस परिवार की यह युवा इंट्री थी.
रमेशचन्द्र झा का समय असहयोग आन्दोलन के बाद और नमक
सत्याग्रह के पहले का है, जो
भारतीय स्वाधीनता के महासमर की आधारशिला भी कही जाती है। इन पर ऐसे ज्वलंत समय का
प्रभाव पड़े बिना नहीं रह सका और सिर्फ 14 साल की उम्र में ही ये स्वतंत्रता
संग्राम की लड़ाई में कूद पड़े. 1942 के ‘भारत छोड़ो आन्दोलन’ में इन्होंने बढ़
चढ़ कर हिस्सा लिया. चंपारण के सुगौली स्थित पुलिस स्टेशन में इनके नाम पर कई
मुकदमे दर्ज किये गए जिनमें थाना डकैती काण्ड सबसे ज्यादा चर्चित रहा. तब वे
रक्सौल के ‘हजारीमल उच्च विद्यालय’ के छात्र थे. एक साल की सज़ा काटकर वे जमानत पर
छूटकर आ तो गए थे पर महीने में दो-तीन बार उन्हें अनिवार्य रूप से मोतिहारी तारीख
पर जाना पड़ता था.
रमेशचन्द्र झा और उनके परिवार की कहानी दरअसल ‘असहयोग
आन्दोनल’ से लेकर ‘अगस्त क्रांति’ तक की चम्पारण की कहानी है. उनका बचपन देश के
तनाव भरे मौसम के बीच गुजरा, और उनका किशोर अगस्त क्रांति को समर्पित हुआ.
अगस्त क्रांति के दौर में अंग्रेजों के दमन के परिणामस्वरूप
24 अगस्त 1942 को बेतिया में गोली काण्ड हुआ और उसने पुरे बिहार को आंदोलित कर
दिया. 26 अगस्त 1942 को कांग्रेस
कार्यकर्ताओं के युवाओं ने सुगौली के पोस्ट औफ़िस पर झंडा फहराकर उसपर कब्जा जमा
लिया. पोस्ट औफ़िस के बाहर स्टेशन और रेलवे थानों में तोड़-फोड़ और लूटपाट भी हुआ और
थाने के कागजात जला दिए गए. जिसकी वजह से अधिकांश स्वतंत्रता सेनानी गिरफ़्तार कर
लिए गए. सुगौली रेलवे थाना लूट और अग्निकांड को लेकर रमेशचन्द्र झा को भी अभियुक्त
बनाया गया पर वे फ़रार हो गए. फिर वे लंबे समय तक फ़रार रहकर ही आन्दोलन चलाते रहे
और अगस्त क्रांति को जीवित रखा. रमेशचन्द्र झा पर रक्सौल के थाना लूट और अग्निकांड
के साथ साथ कई अन्य मामलों का मुकदमा भी चला. यही वजह थी कि उन्हें लंबे समय तक
फ़रार रहना पड़ा. वे जैसे ही एक आरोप से बरी होते, दुसरा आरोप सामने आ जाता.
मोतिहारी जिले के एक जज ने तो यह कह कर एक बार उन्हें माफ़ कर दिया था कि इनता छोटा
और सीधा-साधा दिखने वाला, बच्चों के लिए कवितायेँ लिखने वाला ये लड़का थाना को
लूटने और पिस्टल चुराने जैसा संगीन जुर्म नहीं कर सकता. पर सच्चाई ये थी कि ये
सीधा-साधा दिखने वाला बच्चा दोनों ही ‘अपराधों’ में शामिल था.
कन्हैयालाल
मिश्र
‘प्रभाकर’ द्वारा सम्पादित
तथा विकास लिमिटेड, सहारनपुर (उत्तर प्रदेश) की ओर से प्रकाशित
मासिक पत्रिका ‘नया जीवन’ (सन् 1963) में प्रकाशित एक संस्मरण ‘...और तीसरे दर्जे
का कैदी करार दिया गया’ में रमेशचन्द्र झा ने लिखा
है- “सुगौली का अनवर दारोगा
जानता था कि ये सब मेरा किया धरा है, पर उसे सबसे ज्यादा भय गायब हुई पिस्टल की
वजह से था, इसलिए जब कभी वह मुझे गिरफ़्तार करने आता तो आदर से ही बात करता और मैं
कभी कभी कह देता कि आज गिरफ़्तार होने का मेरा मूड नहीं है..”
बात उन दिनों की है जब फुलवरिया ख़ास, सुगांव और छपरा बहास
पर सामूहिक जुरमाना लगाया गया था. सरकार बेरहमी से जुर्माने की रकम वसूल रही थी.
स्वतंत्रता सेनानी गोकुल ठाकुर ने रमेशचन्द्र झा और रमाकांत झा (नयका टोला) को
सुगाँव जाकर यह नोट करने का निर्देश दिया कि किसके घर में कौन कौन सा सामान सरकार
नीलाम करने के लिए उठा रही है, उसकी कीमत कैसे लगाई जा रही है. इन्हें यह समझ कर
भेजा गया कि इनकी उम्र कम है इसलिए ये गिरफ़्तार होने से बच जायेंगे. पर हुआ
बिल्कुल उल्टा. दोनों ही गिरफ़्तार कर लिए गए. रात भर लॉकप में बंद रहने के बाद दूसरे दिन सुबह हाथों
में हथकड़ियाँ लगाकर सुगौली रेलवे स्टेशन लाया गया...फिर मोतिहारी
स्टेशन से कोर्ट ले जाया गया और इन्हें धारा 38(5) ए भारत रक्षा कानून के अंतर्गत दो साल की सज़ा सुना दी गई.
फुलवरिया के इस बाग़ी परिवार के बारे में कन्हैयालाल मिश्र
ने ठीक ही लिखा है कि- “रमेश चन्द्र झा और उनके परिवार का इतिहास स्वतंत्रता
संग्राम में बर्बाद होकर अट्टाहास करने का इतिहास है....वे उनमें है, जिन्होंने
गुलामी की बेड़ियाँ तोड़ने को स्वयं हथकड़ियाँ पहनी हैं और खौफ़नाक फ़रारी ज़िंदगी का
लुत्फ़ भी उठाया है...वे उनमें हैं, जिन्होंने स्वतंत्रता पाई नहीं कमाई है और वे
उनमें हैं जो स्वतंत्रता के लिए जान की बाज़ी लगा सकते हैं...”
![]() |
| (सुगौली संधि समारोह २०१६ के अवसर पर स्मारिका का कवर पेज) |
सिर्फ
सुगौली से ही 1920 के असहयोग आन्दोलन में अपने सर्वस्व की आहुति देने वालों
में पंडित वैद्द्नाथ मिश्र (करमवा), श्री लक्ष्मीनारायण झा, सुखम मिश्र, श्री
रामावतार लाल, श्री गणेशप्रसाद साह (सुगौली) आदि के नाम आते हैं...और
फिर यह भी याद रखना ज़रूरी है कि नमक सत्याग्रह के मौके पर 15 अप्रैल 1930 को नमक
कानून भंग करने के लिए जो जत्था मोतिहारी के बंजरिया पंडाल से चला था, उसका
नेतृत्व भी रमेशचन्द्र झा के पिता लक्ष्मीनारायण झा और पंडित वैद्द्नाथ मिश्र कर
रहे थे और इसी वजह से वे गिरफ़्तार हुए. चम्पारण
के लिए नमक क़ानून भंग करने का दिन गाँधी के चम्पारण आगमन तिथि 15 अप्रैल 1930 को
ही रखा गया. फुलवरिया गाँव के ही एक बगीचे में नमक कानून भंग किया गया और आज के ही
दिन पंडित वैद्द्नाथ मिश्र (करमवा) और श्री लक्ष्मीनारायण झा (फुलवरिया) ने
बंजरिया पंडाल (मोतिहारी) से चले नमक सत्याग्रहियों के जत्थे का नेतृत्व किया. वैद्द्नाथ
मिश्र और लक्ष्मीनारायण झा दोनों गिरफ़्तार कर लिए गए और इन्हें 6 माह के लिए सश्रम
कारावास की सज़ा देकर हजारीबाग सेन्ट्रल जेल भेज दिया गया. कहना
गलत नहीं होगा कि असहयोग आन्दोलन से लेकर सन 1942 की अगस्त
क्रांति के बीच जिन स्वतंत्रता सेनानी का
घर सबसे ज्यादा लूटा गया है, वो लक्ष्मीनारायण झा और उनके बेटे रमेशचन्द्र झा का
ही है.
रमेशचन्द्र झा सच्चे मायनों में एक राष्ट्रभक्त स्वतंत्रता सेनानी थे.
आजादी की लड़ाई भी लड़े और जेल की यातनाएं भी भोगी. लेकिन हर जेल-यात्रा उनके लिए साहित्यिक वरदान हीं बनी. उनका झुकाव साहित्य और लेखन की तरफ होता गया और आज़ादी के
बाद वे ऐसे आज़ाद हुए कि लेखक हो गए.
राष्ट्र और राष्ट्रीयता की कल्पना भारतीय साहित्य और
संस्कृति में वैदिक काल से ही चली आ रही है. 1857 के सिपाही विद्रोह ने रचनाकारों
में राष्ट्रीयता की जो लहर पैदा की वह लगभग 42 की अगस्त क्रांति और देश की आज़ादी
की बाद ही थमी. गांधी की चम्पारण यात्रा के पहले से ही यहाँ के कवियों ने
राष्ट्रीयता को अपनी रचना का आधार बना लिया था. 1857 के सिपाही विद्रोह के समय से
ही. पर गांधी के चम्पारण सत्याग्रह आन्दोलन ने इस भावना को चरम पर पहुंचा दिया. इस
सन्दर्भ में चम्पारण से पहला नाम आता है- गोपाल सिंह नेपाली का. मुंगेर के विख्यात
साहित्यकार कुमार केदारनाथ राय केशरी ने लिखा है कि “कविवर नेपाली के निधन से
जो स्थान रिक्त हुआ है, उसकी पूर्ति की साक्षात मूर्ति रमेशचंद्र झा जी हैं.”
रमेशचन्द्र झा के पास भी चूँकि खुद का भोगा हुआ यथार्थ था, देश प्रेम था, गाँधी
दर्शन का प्रभाव था, उन्होंने राष्ट्रीय साहित्य और अपने समकालीनों को पढ़ भी रखा
था, इसलिए उनकी रचना में यह सब कुछ सहज अभिव्यक्ति पाता गया. उनकी एक कविता कुछ इस
तरह से है-
“जन्म-जन्म
से अंगारों के बीच निखरने वाले,
समर भूमि से
बिना विजय के कभी न फिरने वाले I
और देश के
लिए लहू का सागर तिरने वाले,
मातृभूमि की
सेवा पर मर मिटने के अभिलाषी
जय ये भारत
वासी I”
जब वे लिखते हैं- “मेरे
जीवन से ऊपर अपना देश है / मेरी आकुल आँखों का सपना देश है”. तो साफ़ पता चलता
है कि कवि देश को सबसे ऊपर मानता है. भारत पर हुए चीनी हमले और पाकिस्तानी हमले के
समय उन्होंने “यह देश है वीर जवानों का” नाम की किताब भी लिखी. जिसकी
भूमिका तात्कालिक रक्षा मंत्री यशवंत राव बलवंत राव चाव्ह्वान ने लिखी थी और जिसे
देश के लगभग सभी सैनिक पुस्तकालयों में रखा गया. यह किताब दिल्ली के राजधानी ग्रन्थागार
से प्रकाशित हुई. गौरतलब है कि तब इनके सबसे छोटे भाई महेशचन्द्र झा भारतीय सेना
में ही थे. इनके अन्य कविता संग्रह “देश हमारा : धरती अपनी”, “भारत देश हमारा,
‘जवान जागते रहो”, “जय बोलो हिन्दुस्तान की”, “हिमालय की आग” आदि में भी
राष्ट्रीयता का स्वर प्रमुख है. ये नामकरण, ये शीर्षक इस तथ्य की अभिव्यक्ति हैं
कि रचनाकार को अपनी मातृभाषा के प्रति असीम श्रद्धा है. उनकी प्रारंभिक रचनाएं
“चलो दिल्ली” नाम के कविता-संग्रह में प्रकाशित हैं. इस काव्य-संग्रह में एक कविता
है-
“वतन के
स्वाभिमान तुम
बढ़े चलो
जवान तुम
गुलामियों
की रस्सियाँ उमेठ दो, मरोड़ दो
बता रही है
ज़िंदगी कि मुश्किलों से होड़ लो”
मुश्किलों से होड़ लेकर
ही गुलामी की बेड़िया तोड़ी जा सकती थीं. गौर करें तो ये पंक्तियाँ उस समय की हैं,
जब नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने “दिल्ली चलो” का नारा बुलन्द किया था. रमेशचन्द्र
झा ने उस आवाज़ में आवाज़ मिलाई और अपनी सशक्त लेखनी से तत्कालीन पीढ़ी में बलिदान की
भावना जागृत की.
रामवृक्ष बेनीपुरी ने
लिखा भी है कि “दिनकर के साथ बिहार में कवियों की
जो नयी पौध जगी, उसका अजीब हस्र हुआ...आखें खोजती हैं इसके बाद आने वाली पौध कहाँ है...कभी
कभी कुछ नए अंकुर ज़मीन की मोती पर्त को छेद कर झांकते हुए से दिखाई पड़ते हैं...
रमेश भी एक अंकुर है और वह मेरे घर का है, अपना है. अपनापन और पक्षपात, सुनता हूँ साथ-साथ चलते हैं किन्तु तो भी अपनापन तो छोड़ा नहीं जा सकता, ममत्व की ज़ंजीर को तोड़ा नहीं जा सकता ! पक्षपात ही सही बेधड़क कहूंगा कि
रमेश की चीज़ें मुझे बहुत पसंद आती रही हैं...”
आज़ादी
के बाद उन्होंने राजनीति न चुनकर लेखन चुना था और एक स्वन्त्रत लेखक के रूप में हर
विधा पर चुपचाप लिखते रहे. यह भी एक अलग तरह की देश सेवा थी, साहित्य सेवा थी. एक
ज़िम्मेदार और सच्चा देशभक्त किसी फुटबॉलर, क्रिकेटर या फ़िल्म स्टार की तरह
रिटायर्ड नहीं होता, वह हमेशा कार्यरत होता है, लगातार. रमेशचन्द्र झा की तरह लिखते
हुए- “अकिंचन दिया साधना का अकेला / जनम से जला है मरण तक जलेगा I अमरदीप जीवन
सजग प्राण बाती / बहुत ही कठिन साध की लौ बुझाना I विरह का दिया है मिलन तक चलेगा
/ अकिंचन दिया साधना का अकेला I”
सन्दर्भ ग्रन्थ :-
§
फ्रीडम मूवमेंट इन बिहार (लेखक- के. के. दत्त)
§
अगस्त क्रांति ( प्रो० बलदेव नारायण)
- चम्पारण और महात्मा
गाँधी (विष्णुकांत पाण्डेय)
- हिन्दी साहित्य को
चम्पारण की देन (डॉ शोभाकांत झा)
- सुगौली : तब और अब
(सं०- विश्वनाथ कुमार)
- बिहार थ्रू द एजेज :
वॉल्यूम-2 (सं०- एस. आर. बक्षी, ऋतू चतुर्वेदी)
- चम्पारण टू क्विट
इंडिया मूवमेंट (लेखक- रविन्द्र कुमार)
- रमेशचन्द्र झा :
व्यक्ति और व्यक्तित्व (सं०- विश्वनाथ कुमार)
- जेल के वे दिन: 1942
(संस्मरण, लेखक- रमेशचन्द्र झा/ ‘स्मारिका’ नवयुवक पुस्तकालय, मोतिहारी)
संजीव कुमार झा
(यह लेख सुगौली संधि समारोह २०१६ के अवसर पर स्मारिका में प्रकाशित हुआ था)

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