आँखन देखी
तू कहता कागद की लेखी...मैं कहता हूँ आंखन देखी
Wednesday, May 9, 2018
Thursday, June 1, 2017
Thursday, May 4, 2017
की पुछदे ओ हाल : शिव कुमार बटालवी
की पुछदे ओ हाल फकीरां दा
साडा नदियों विछड़े नीरां दा
साडा हंज दी जूने आयां दा
साडा दिल जलयां दिल्गीरां दा.
साडा दिल जलयां दिल्गीरां दा.
साणूं लखां दा तन लभ गया
पर इक दा मन वी न मिलया
क्या लिखया किसे मुकद्दर सी
हथां दियां चार लकीरां दा.
पर इक दा मन वी न मिलया
क्या लिखया किसे मुकद्दर सी
हथां दियां चार लकीरां दा.
तकदीर तां अपनी सौंकण सी
तदबीरां साथों ना होईयां
ना झंग छुटिया, न काण पाटे
झुंड लांघ गिया इंज हीरां दा.
तदबीरां साथों ना होईयां
ना झंग छुटिया, न काण पाटे
झुंड लांघ गिया इंज हीरां दा.
मेरे गीत वी लोक सुणींदे ने
नाले काफिर आख सदींदे ने
मैं दर्द नूं काबा कह बैठा
रब नां रख बैठा पीड़ां दा.
###नाले काफिर आख सदींदे ने
मैं दर्द नूं काबा कह बैठा
रब नां रख बैठा पीड़ां दा.
मैंनू तेरा शबाब लै बैठा,
रंग गोरा गुलाब लै बैठा।
.
किन्नी पीती ते किन्नी बाकी ए
मैंनू एहो हिसाब लै बैठा
रंग गोरा गुलाब लै बैठा।
.
किन्नी पीती ते किन्नी बाकी ए
मैंनू एहो हिसाब लै बैठा
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फेर कदे ना वापस आवां ,
जी चाहे पंछी हो जावां ,
उड़दा जावां गांदा जावां...
अनछू शिखरं नूं छू पावां...
इस दुनिया दियां राहां भुल्लके ,
फेर कदे ना वापस आवां ,
जी चाहे पंछी हो जावां
जी चाहे पंछी हो जावां ,
उड़दा जावां गांदा जावां...
अनछू शिखरं नूं छू पावां...
इस दुनिया दियां राहां भुल्लके ,
फेर कदे ना वापस आवां ,
जी चाहे पंछी हो जावां
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जाने कौनसी नदी का नीर है वो फकीर--- बिछ़ड़ता है तो मर मर जाता है--- बहता है तो घुल घुल जाता है--- ओ रे फकीर--- तेरी राह अव्वली---
की पुछदे ओ हाल फकीरां दा----साडा नदियों बिछड़े नीरां दा----
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रोग बन के रह गया है प्यार तेरे शहर का
मैंने देखा है मसीहा बीमार तेरे शहर का
मैंने देखा है मसीहा बीमार तेरे शहर का
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ki puchde ho haal fakiran da...
sada nadiyon vichreyan neeran da...
sada hanj di joone aaya da...
sada dil jaleya dilgiran da...
ki puchde ho haal fakiran da...
eh jandeya kuch shauk jaheyan-२
rangan da hi naam tasveeran hai...
jad hadh gaye-2 asi ishqe di...
mul kar baithe tasveeran da...
ki puchde ho haal fakiran da...
sada nadiyon vichreyan neeran da...
takdeer ta sadi shautan si...2
tadbeeran sathon na hoyiyan...
na jhang chuteyan na kanh phaate...
jhundh langh gaya inj hi heeran da...
ki puchde ho haal fakiran da...
sada nadiyon vichreyan neeran da...
sanu lakhan da tan labh gaya...
par ik da man vi na mileya...
kya likheya kisse mukkadar si...
haathan diya chaar lakeeran da...
ki puchde ho haal fakiran da...
sada nadiyon vichreyan neeran da...
sada hanj di joone aaya da...
sada dil jaleya dilgiran da...
mere geet vi lok suninde ne...
nalle kafir akh sadinde ne...
main dard nu kabba keh baitha...
rabb naam rakh baitha peerhan da...
ki puchde ho haal fakiran da...
sada nadiyon vichreyan neeran da...
Tuesday, May 2, 2017
थोड़ा सा … (अशोक वाजपेयी)
अगर बच सका
तो वही बचेगा
हम सबमें थोड़ा-सा आदमी…
जो रौब के सामने नहीं गिडगिडाता,
अपने बच्चे के नंबर बढ़वाने नहीं जाता मास्टर के घर,
जो रास्ते पर पड़े घायल को सब काम छोड़कर
सबसे पहले अस्पताल पहुंचाने का जतन करता है,
जो अपने सामने हुई वारदात की
गवाही देने से नहीं हिचकिचाता –
वही थोड़ा-सा आदमी –
जो धोखा खाता है पर प्रेम करते रहने से नहीं चूकता,
जो अपनी बेटी के अच्छे फ्राक के लिए
दूसरे बच्चों को थिगड़े पहनने पर मजबूर नहीं करता-
जो दूध में पानी मिलाने से हिचकता है,
जो अपनी चुपड़ी खाते हुए
दूसरे की सूखी के बारे में सोचता है –
वही थोड़ा-सा आदमी –
जो बूढों के पास बैठने से नहीं ऊबता
जो अपने घर को चीजों का गोदाम बनने से बचाता है,
जो दुख को अर्जी में बदलने की मजबूरी पर दुखी होता है
और दुनिया को नरक बना देने के लिए
दूसरों को ही नहीं कोसता|
वही थोड़ा-सा आदमी
अगर बच सका
तो वही बचेगा
रेनर मरिया रिल्के की कविता- निष्ठा
मेरी आंखें निकाल दो
फिर भी मैं तुम्हें देख लूंगा
मेरे कानों में सीसा उड़ेल दो
पर तुम्हारी आवाज़ मुझ तक पहुंचेगी
पगहीन मैं तुम तक पहुंचकर रहूंगा
वाणीहीन मैं तुम तक अपनी पुकार पहुंचा दूंगा
तोड़ दो मरे हाथ,
पर तुम्हें मैं फिर भी घेर
लूंगा और अपने ह्दय से इस प्रकार पकड़ लूंगा
जैसे उंगलियों से
ह्दय की गति रोक दो और मस्तिष्क धड़कने लगेगा
ह्दय की गति रोक दो और मस्तिष्क धड़कने लगेगा
और अगर मेरे मस्तिष्क को जलाकर खाक कर दो-
तब अपनी नसों में प्रवाहित रक्त की
बूंदों पर मैं तुम्हें वहन करूंगा।
(अनुवाद- धर्मवीर भारती )
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