Tuesday, May 2, 2017

थोड़ा सा … (अशोक वाजपेयी)

अगर बच सका
तो वही बचेगा
हम सबमें थोड़ा-सा आदमी…
जो रौब के सामने नहीं गिडगिडाता,
अपने बच्चे के नंबर बढ़वाने नहीं जाता मास्टर के घर,
जो रास्ते पर पड़े घायल को सब काम छोड़कर
सबसे पहले अस्पताल पहुंचाने का जतन करता है,
जो अपने सामने हुई वारदात की
गवाही देने से नहीं हिचकिचाता –
वही थोड़ा-सा आदमी –
जो धोखा खाता है पर प्रेम करते रहने से नहीं चूकता,
जो अपनी बेटी के अच्छे फ्राक के लिए
दूसरे बच्चों को थिगड़े पहनने पर मजबूर नहीं करता-
जो दूध में पानी मिलाने से हिचकता है,
जो अपनी चुपड़ी खाते हुए
दूसरे की सूखी के बारे में सोचता है –
वही थोड़ा-सा आदमी –
जो बूढों के पास बैठने से नहीं ऊबता
जो अपने घर को चीजों का गोदाम बनने से बचाता है,
जो दुख को अर्जी में बदलने की मजबूरी पर दुखी होता है
और दुनिया को नरक बना देने के लिए
दूसरों को ही नहीं कोसता|
वही थोड़ा-सा आदमी
अगर बच सका
तो वही बचेगा 

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