Friday, April 8, 2016

सुगौली संधि समारोह २०१६ : एक टिपण्णी

(सुगौली संधि समारोह २०१६ के अवसर पर रमेशचन्द्र झा की किताब "स्वाधीनता समर में सुगौली" का लोकार्पण करते अतिथि) 


भारत भूमि पर हुए कुछ ऐतिहासिक युद्धों और संधियों में भारत-नेपाल संधि अपना अलग मायने और महत्व रखता है. जैसा कि हम सब जानते हैं कि 19वीं सदी के शुरुआती दौर में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी और नेपाल के बीच 4 मार्च, 1816 ई. को जो ऐतिहासिक सुगौली संधि हुई उसके दौ सौ साल पुरे हो चुके हैं. आपसी द्वन्द, टकराव और युद्ध को ख़त्म करने और शांति बहाल करने के उद्देश्य से किये इस ऐतिहासिक संधि को अपने मूल उद्देश्य में सफलता भी मिली. और इन दो सौ सालों में न सिर्फ हम दोनों पड़ोसी देशों भारत और नेपाल के संबंध और प्रगाढ़ हुए हैं बल्कि हमने सभी स्तरों पर आपसी तालमेल बिठाकर प्रगति भी की है. 

भारत और नेपाल के सम्बन्ध आधुनिक राष्ट्र या राज्य की अवधारणा उत्पन्न होने से पहले अर्थात् ऐतिहासिक कालखण्ड से ही दोनों देशों की जनता के स्तर पर कायम नजर आता है. भारत और नेपाल लगभग एक ही तरह की सभ्यता में विकसित हुए हैं. इन दोनों ही देशों का शांति और अहिंसा से गहरा संबंध रहा है. दोनों ही देशों का संबंध महात्मा बुद्ध से रहा है और दोनों ही देश युद्ध छोड़कर शान्ति अपनाने वाले देश हैं. इसीलिए भी इन दोनों देशों के बीच का सम्बन्ध आज भी अपनी सुगंध फैला रहा है और अपने नये आयामों के साथ आगे बढ़ रहा है. जिसकी भविष्य में हम और बेहतर और सुदृढ़ होने की कामना करते हैं.

हमारे आपसी रिश्ते कुटनीतिक कम और भावुक ज़्यादा हैं. इसलिए हमें यह संकल्प लेना है कि भारत-नेपाल अपने आपसी रिश्ते का सम्मान करे. भारत का नेपाल के साथ जुड़ाव सिर्फ राजनीतिक और व्यापारिक या आर्थिक स्तर पर ही नहीं बल्कि सामाजिक और पारिवारिक स्तर पर रहा है. नेपाल की लंबी सीमा (क़रीब 1712 किलोमीटर) भारत से जुड़ती है. तराई के लोगों का भारत में लगातार आना-जाना है तथा सीमापार शादियां और रिश्तेदारी होती हैं. 

नेपाल और भारत के सम्बन्ध का पुराना, ऐतिहासिक और सामान्तया दो देशों के बीच में होने वाले सम्बन्धों से हटकर अर्थात् नवीन तरह के एक विशेष सम्बन्ध के रूप में माना जाता है. परन्तु यह भी नहीं कहा जा सकता कि यहां कोई समस्या ही नहीं है.  समय, परिस्थिति और इसे कार्यान्वयन करने वाले राजनैतिक नेतृत्व में होने वाले परिवर्तन की वजह से भी नेपाल और भारत के सम्बन्ध में समय-समय पर मोड़ आता रहा है. और साथ ही साथ खुली सीमा और इसके परिणामों को लेकर दोनों देशों के जनस्तर और सरकारी स्तर पर समय-समय पर बातचीत होती आई है और असंतुष्टियों का आदान-प्रदान होता आया है. इन सबके बावजूद यह स्वीकार किया जाना चाहिए कि भारत और नेपाल को छोड़कर शायद ही किसी दो पड़ोसी देशों के बीच इतने घनिष्ठ और अंतरंग संबंध रहे हों. भारतीय और नेपाली इतनी सहजता से आपस में घुल-मिल जाते हैं कि उन्‍हें एक दूसरे के देश में मुश्‍किल से ही विदेशी के रूप में देखा जाता है. इसकी जड़ें इतिहास में हैं. इतिहास गवाह है कि भारत ने नेपाल के वर्षों से चले आ रहे गृह युद्ध को ख़त्म करने की शांति प्रक्रिया में निर्णायक भूमिका निभाई थी. ऐसे निर्माणकारी इतिहास और अतीत का होना किसी भी देश के लिए सम्मान की बात है.

हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि 47 की आज़ादी से पहले नेपाल भारतीय स्वतन्त्रता सेनानियों का शरण-स्थल भी रहा है. हमारे सुगौली के स्वतन्त्रता सेनानियों और बागियों को जब भी अँगरेज़ गिरफ़्तार करने की कोशिश करते और उन्हें गिरफ़्तार नहीं होना होता, तो वे प्रायः नेपाल भाग जाते और अपने किसी रिश्तेदारी में जाकर थोड़े दिन मौज के साथ रहते.

आज भी अगर हम देखें तो जहाँ एक तरफ़ नेपाल के सबसे बड़े मंदिर पशुपतिनाथ में भारतीय मूल के पुजारी कई दशकों से अपनी सेवाएं दे रहे हैं, वहीँ दुसरी तरफ़ भारत की राजधानी दिल्ली के कुछ मंदिरों में पूजा-पाठ का जिम्मा नेपाली पंडितों के हवाले है. इसलिए हमें दो देशों के बीच आपसी संबंध को बहुत गहरा और व्यवस्थित बनाकर आगे बढ़ना होगा. एक पड़ोसी देश से कहीं आगे बढ़कर एक-दुसरे का साथ देना होगा, एक दुसरे से सामंजस्य बिठाना होगा. जिससे दोनों खुशहाली के लिए मिलकर काम करते हुए और नज़दीक आएंगे.

जहाँ तक सुगौली की इस ऐतिहासिक भूमि और उसके योगदान और महत्व का प्रश्न है तो यह सर्वविदित है कि सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और साहित्यिक दृष्टि से सुगौली की अपनी उल्लेखनीय विशेषताएं हैं. सुगौली न केवल अँगरेज़-नेपाल युद्ध का संधि-स्थल है बल्कि भारतीय स्वाधीनता आन्दोलन की एक महत्वपूर्ण कड़ी भी है. आज़ादी के इतिहास में अगर चम्पारण का स्थान शीर्ष पर है, तो सुगौली ह्रदय-स्थली है.

इस अवसर पर सुगौली के फुलवरिया, सुगाँव, करमवा, पजिअरवा जैसे अनेक गाँवों का ज़िक्र ख़ास तौर पर उल्लेखनीय है, जहाँ के लगभग हर घर का एक न एक सदस्य आज़ादी की लड़ाई में शामिल था. उदहारण के तौर पर फुलवरिया गाँव के सिर्फ़ एक ही परिवार से सभी सदस्य एक साथ आज़ादी के लिए लड़ते पाए गए. लक्ष्मीनारायण झा और रमेशचंद्र झा पिता-पुत्र दोनों ने ही अपने अपने तरह से आज़ादी की अनोखी लड़ाई लड़ी और उसका नुकसान उठाया. चाहे वह नमक कानून भंग करना हो या लोगों में देशहीत और राष्ट्रीयता की भावना भरनी हो, सुगौली के स्वतंत्रता सेनानी हमेशा आगे रहे. सरयू प्रसाद नायक, शम्भुनाथ मिश्र या बाबूलाल मिश्र जैसे यहाँ के सेनानियों ने स्वाधीनता संग्राम में अहम भूमिका निभाई. सुगौली और यहाँ के सेनानियों की यहीं सक्रियता राष्ट्रीय स्तर के विख्यात लोगों को भी यहाँ तक खिंच लाई. 

सुगौली की गौरव-वृद्धि में यहाँ के निवासियों के योगदान के साथ-साथ कई राष्ट्रीय ख्याति की महान विभूतियों का आगमन भी जुड़ा हुआ है. ऐसी विभूतियों में महात्मा गाँधी, सीमान्त गाँधी खान अब्दुल गफ्फ़ार खान, आचार्य जे. बी. कृपलानी, रामवृक्ष बेनीपुरी से लेकर प्रथम राष्ट्रपति देश रत्न डॉ० राजेंद्र प्रसाद का नाम प्रमुख है. जहाँ एक तरफ़ सुगौली के ही फुलवरिया गाँव के एक बगीचे में नमक कानून भंग करने में जुटे नमक सत्याग्रहियों को संबोधित करने अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस कमिटी के महामंत्री आचार्य जे० बी० कृपलानी फुलवरिया पहुचे, तो वहीँ दुसरी तरफ़ नमक कानून भंग करने पद-यात्रा पर निकले सत्याग्रहियों के एक जत्थे का हौसला बढ़ाने डॉ० राजेंद्र प्रसाद सुगौली आए.

स्वतंत्रता सेनानी और लेखक रमेशचन्द्र झा की लिखी किताब “स्वाधीनता समर में सुगौली” यहाँ के गौरवशाली अतीत का बहुत ही प्रमाणिक और विस्तृत उल्लेख करती है. स्वाधीनता के लिए राष्ट्रीय स्तर पर लिए जा रहे निर्णयों का कार्यान्वयन किस तरह एक छोटे से कस्बे में बड़े ही अनुशाषित ढंग से होता है, यह इस किताब में दर्ज है. सुगौली हर तरह से अपना योगदान सिद्ध करता रहा है...जो स्मरणीय और ऐतिहासिक है. स्वाभाविक रूप से यहाँ के लोगों को रचनात्मक प्रवृति अपने समृद्ध इतिहास से विरासत में मिली है...वर्तमान में अरविन्द मोहन जैसे रचनाकार और पत्रकार सुगौली से ही निकल कर राष्ट्रीय स्तर पर अपना योगदान दे रहे हैं, जो न सिर्फ़ सराहनीय है बल्कि आने वाली पीढ़ी के लिए प्रेरणादायी भी है.


सुगौली संधि समारोह जैसा आयोजन न सिर्फ़ सदियों पुराने और महत्वपूर्ण इतिहास को समेटने और समझने के लिए ज़रूरी हैं बल्कि आज के समय में हमारा नया मार्ग प्रशस्‍त करने में और हमारे अन्दर नई ऊर्जा भरने में सहायक हो सकते हैं. 


संजीव के झा 
वर्सोवा, मुंबई 


No comments: