सन् 1961 की बात है । अमृता प्रीतम पहली बार सोवियत रूस गईं थीं । वहाँ तजाकिस्तान में उन्होंने एक मर्द और एक औरत को देखा । वे एक जंगल में किसी नदी किनारे लकड़ी की एक झोंपड़ी में रहते थे । औरत की नीली आँखों में और मर्द की काली आँखों में एक-एक घड़ी जिए हुए इश्क का जलाल था । पता चला कि उनकी अब की करीब साठ-साठ बरसों की उम्र, इश्क का दस्तावेज़ है ।
आगे की कहानी मैं आपको सीधे-सीधे बता दूँ ।
मर्द की उठती जवानी थी, जब वह कश्मीर से किसी काम को तजाकिस्तान आया था । और उस नीली आंखों वाली सुंदरी ने उसे फिर नहीं जाने दिया । वे दो मुल्कों की दो नदियों की तरह मिले तो उनमें एक-सा पानी बहने लगा । वे लकड़ी की झोंपड़ी बना कर जंगल में रहने लगे और वहीं झोंपड़ी उनके इश्क की दरगाह बन गई । औरत माथे पर पटका बांध कर और बदन पर एक लम्बा-सा चोला पहनकर जंगल के पेड़ों की देख-रेख करने लगी । और वह मर्द आज तक वहीं कश्मीर का पट्टी वाला कोट और कश्मीरी टोपी पहनकर सभी कामों में उसकी मदद करता है ।
क्या उनका जीवन मुल्कों के बीच तने तोपों पर प्रेम की फसल पैदा करने के लिए पर्याप्त नहीं । हमारे देश के लिए इससे शर्म की बात और क्या हो सकती है कि हम आज भी अपने प्रेमी जोड़ों का गला काट रहे हैं और उनके खून परोस रहे हैं थाली में । यह मुल्क चुप होकर शायद इंतजार कर रहा है उन खून के सूख कर जमने की ताकि सब मांसाहार कर सकें । पी सकें शराब, सिगरेट, सिगार और गांजा । सीख सकें गुर किसी अंजुम राजाबली से फिल्म चुराने के और बना सकें कोई मनोरंजक फिल्म !
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