अगरचे ज़ोर हवाओं ने डाल रक्खा है
मगर चराग़ ने लौ को संभाल रक्खा है
किसी बेवफ़ा की ख़ातिर ये जुनूँ 'फ़राज़' कब तक
जो तुम्हें भुला चुका है उसे तुम भी भूल जाओ
तुम तकल्लुफ़ को भी इख़्लास समझते हो 'फ़राज़'
दोस्त होता नहीं हर हाथ मिलाने वाला
ज़ब्त लाज़िम है मगर दुख है क़यामत का 'फ़राज़'
ज़ालिम अब के भी न रोएगा तो मर जाएगा
तुम तक़ल्लुफ़
को भी इख़लास समझते हो ‘फ़राज़’
दोस्त होता नहीं
हर हाथ मिलाने वाला
एक अरसे बाद मिले
तो उसने मेरा नाम पूछ लिया फराज
बिछड़ते वक्त जिसने
कहा था तुम्हारी बहुत याद आयेगी
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