Friday, April 15, 2016

हिंसा की दारूण उपस्थिति और 'क्षमा करो हे वत्स' (आलेख) : संजीव कुमार झा

अगर आप लोगों ने फ्रांसिसी फिल्मकार कोस्ता-गावरास की मशहूर फिल्म ‘मिसिंग’ देखी हो, तो आपने देखा होगा कि कैसे खेल के मैदान से ग़ायब हो गए अपने बेटे को खोजता हुआ एक पिता भय, आतंक और हत्याओं का गवाह बनता है । अपने समय की क्रूरतम सच्चाईयों का सामना करता हुआ वह अपने बेटे की घर-वापसी के अलावा और कुछ नहीं चाहता । गुमशुदा बेटे की तलाश में फिल्म जैसे-जैसे आगे बढ़ती है, हमे पता चलने लगता है कि पुलिस, प्रशासन, ब्यूरोक्रेट्स, खुफिया विभाग, राजनीतिक पार्टियां अथवा ऐसी ही सत्ताएं बाहर से जैसी दिखती हैं, भीतर से वैसी नहीं हुआ करतीं.....

यही वह बिन्दु है जहां पर हिंदी के प्रतिष्ठित कथाकार  देवेन्द्र की कहानी ‘क्षमा करो हे वत्स’न सिर्फ अपनी व्यापकता ग्रहण करती है बल्कि कहानी के भीतर छिपी सिनेमाई संभावनाओं को भी उजागर करती है । कहानी में एक बेटे के गुम हो जाने के बाद उसकी तलाश में परेशान पिता को होने वाली दिक्कतों के पीछे लेखक ने लगातार अमानवीय होते जा रहे प्रशासन-तंत्र, व्यवस्था और मनुष्य के चेहरे को बेनकाब किया है । जो अंततः अमानवीय कृत्यों के खि़लाफ खड़ी एक मानवीय कहानी का रूप अख्तियार करती है । और अगर आपनेउदय प्रकाश से साक्षात्कार की किताब ‘मेरी उनकी बात’ पढ़ी हो तो आपने पढ़ा होगा किदेवेन्द्र की इसी कहानी का उल्लेख करते हुए उदय प्रकाश ने यह चिंता ज़ाहिर की थी कि ‘कहीं ऐसा न हो कि हिन्दुस्तान भी हिंसा, रक्तपात, सट्टेबाज़ी और तमाम तरह के अपराधों से भरे हुए देश में या ब्राजील जैसे माफिया तंत्र में बदलता चला जाए !’

यह कहानी दरअसल मनुष्य की ओर से हिंसा के खि़लाफ़ आवाज़ उठाती है, जो भ्रष्ट अफसरशाही और व्यवस्था के नाम पर पनपते हैं । कुछ-कुछ कोस्ता-गावरास की ही एक दूसरी फिल्म ‘जे़ड’ (Z) के जैसी । कहा जा रहा है कि हिंसा अब साहित्य में अचानक उभार लेती दिख रही है । सर्बिया से लेकर फिलिस्तीन, इराक, चीन, पाकिस्तान और हिन्दुस्तान में भी हिंसक दास्तानें साहित्य में दर्ज हो रही हैं । हिंसा एक ऐसी परिघटना बनके उभरी है कि उसने पूरब-पश्चिम का भेद मिटा कर रख दिया है । आउटलुक को दिए एक इंटरव्यू मेंउदय प्रकाश कहते हैं- ‘एक बहुत ही सक्रिय सिर एक बहुत ही निष्क्रिय धड़ पर रखा हुआ है’ ।

किसी भी साहित्यिक रचना के रूपांतरण से पहले हमें एक बात ठीक ढंग से समझ लेनी चाहिए । 'Adapt' शब्द (verb) का अर्थ ही है- to transpose from one medium to another । साहित्य और सिनेमा दोनों बिल्कुल अलग-अलग माध्यम हैं और जब हम किसी रचना को एक माध्यम से दूसरे माध्यम में बदलते हैं तो उसमें परिवर्तन आना स्वाभाविक है । फिल्म निर्माण के शुरूआती दिनों में किसी भी साहित्यिक कृति से कथा ग्रहण करके फिल्म बनाने की प्रक्रिया ठीक उसी प्रकार थी जिस प्रकार उसकी कार्बन काॅपी प्रस्तुत कर देना अथवा एक बर्तन का पानी दूसरे बर्तन में उड़ेल देना । लेकिन जैसा कि हाॅलीवुड के मशहूर फिल्मकार आर्सन वेल्स ने कहा था- ‘यदि आप अपने माध्यम के अनुरूप रूपांतरण के लिए चुनी गई रचना में बदलाव नहीं ला रहे हैं, तो एडाप्टेशन की ज़रूरत ही क्या है ।’

अब बात आती है, कहानी के चयन की । फिल्म निर्देशक या लेखक के लिए किसी कहानी का चयन ज्यादातर उसकी पसंद पर निर्भर करता है । लेकिन इससे अलग एक और बात है जो महत्वपूर्ण है । वह यह कि फिल्मांकन की तमाम छूट लेने के बावजूद हर साहित्यिक कृति पर फिल्म बनाना संभव नहीं है । फिल्मों के लिए ऐसी ही कृति का चयन किया जाना चाहिए, जिसमें फिल्मांकन की पूरी संभावना हो । जिसके आधार पर एक सिनेमैटिक स्क्रिप्ट लिखी जा सके । कहानी में यदि सिनेमा की संभावनाएं नहीं हैं, उसके भीतर सिनेमाई अपील नही है तो उसका रूपांतरण किसी भी तरह से लाभदायक नहीं हो सकता । साहित्य की गूढ़ बातें पढ़ने में तो अच्छी लगती हैं लेकिन पर्दे पर वे जितनी सहज और सरल ढंग से आए उतना ही अच्छा है ।

दशकों पहले एक साहित्यकार ने जिस घटनाक्रम को रचा था, आज परदे पर उनकी दर्शनियता अप्रासंगिक लग सकती है । वर्षों पहले की कोई कथा आज के परिवेश में अपनी प्रासंगिकता गंवा सकती है । यहीं से फिल्मकार का काम शुरू होता है । वह पूरे घटनाक्रम को नई दृष्टि से पेश करता है । अपने समय से कथा को जोड़कर उसे जीवंत बनाता है ।ओमकारा को अगर आॅथेलो का एडाप्टेशन नहीं भी कहा जाए तो भी वह ओमकारा है । अच्छे एडाप्टेशन के बाद एक फिल्म किसी रचना से ऐसे ही मुक्त हुआ करती है । मक़बूल कोमैकबेथ की कार्बन काॅपी कोई नहीं कह सकता । फिल्म एडाप्टेशन को कभी भी कार्बन काॅपी नहीं होनी चाहिए ।

कहानी का चयन करते समय उस तरह के साहित्य की श्रेष्ठतम उपलब्धियों को भी नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता । उसी जाॅनर या विषय की क्लासिक फिल्मों पर बिना निगाह डाले उत्कृष्ट फिल्म की बुनियाद भी नहीं पड़ सकती । रूपांतरण तो फिर भी एक जटिल काम है । रचना को अपने समय से और वास्तविक जीवन-चरित्रों से जोड़ना सबसे अहम होता है । इसके बिना ‘वारेन हेस्टिंग्स का सांड’ या ‘मोहनदास’ नहीं लिखी जा सकती । विभूति भूषण बंधोपाध्याय की ‘पाथेर पांचाली’ को क्या आज उसी टेक्सचर में बनाना संभव होगा ? अब यही आप ज़रा ‘रंग दे बसंती’ को याद करिए । हालांकि वह कोई एडाप्टेशन नहीं है । फिर भी उसमें इतिहास और वर्तमान की आवाजाही लगातार बनी रहती है । अनुराग कश्यप की देव डी कुछ-कुछ ऐसे ही अर्थों में अपने समय से जुड़ती है । समकालीन हुए बिना कोई गुंजाईश नहीं । या फिर ओमकारा की तरह लोकल होकर ग्लोबल होना पड़ेगा ।

‘क्षमा करो हे वत्स’ कहानी की सबसे बड़ी ताकत है उसका विषय । यह कहानी एक ऐसी समस्या को उठाती है जो विश्व-व्यापी है । संवेदनाओं, समस्याओं और मुद्दों को इस कहानी में पाकर पाठक बड़ी आसानी से जुड़ जाता है । उस पर फिल्म सिर्फ इसलिए नहीं बननी चाहिए क्योंकि वह फिल्म मेंकिंग की आकांक्षाओं की कहानी है बल्कि इसलिए कि उसमें कुछ है जो फिल्म बनने से ही स्पष्ट होगी । कहानी में एक बच्चे का अपहरण कर लिया गया है और उसका पिता उसकी खोज में लगातार हताशा और निराशा का शिकार हो रहा है । इतनी फास्ट और लोइंग कहानी है कि आप पढ़ते चले जाते हैं । पिता जो गांव से बाहर रहता है, एक दिन अचानक उसे फोन आता है कि उसके बच्चे का अपहरण कर लिया गया है । कहानी अपने शुरूआत में ही पाठकों का ध्यान पकड़ लेती है । फिर कहानीकार हमें जहां ले जाना चाहता है, हम उसके पीछे-पीछे चलते चले जाते हैं । आखिर में जब तक हमें बच्चे की हत्या के बारे पता चलता है, तब तक पाठक उस बच्चे से भावनात्मक रूप से जुड़ चुके होते है । हिंसा की विभत्स उपस्थिति दिल दहला कर रख देती है । हमें लगने लगता है कि ऐसे बर्बर और हिंस्र समाज में हर व्यक्ति किसी न किसी हिंसा का, ताकत के उन्माद और बर्बरता का ‘विक्टिम’ है ।

एक लेखक अपनी जाति में रहकर हिंसा और दहशत की दास्तन एक बच्चे के माध्यम से पेश करता है । उसी बच्चे के माध्यम से जिसे हम आने वाली पीढ़ी या नस्ल कहते हैं । कोई भी संवेदनशील व्यक्ति एक पूरी सल्तनत को ही लेकर क्या करेगा जिसमें बच्चों का जीवन असुरक्षित है । वर्षों पहले भय, दहशत और आतंक की उपस्थिति को वाॅन गाॅग ने भी अपनी जाति से परे जाकर पेड़-पौधों के भीतर झांका था । जरा ठहर कर, उसकी बनाई उस पेंटिंग को याद करिए जिसमें आकाश में गहराते तूफान की आशंका में किसी खेत में मक्के के पौधे डर कर सिहर गए हैं । पिकासो के बारे में तो कहा ही जाता है कि वह अपने जीवन भर बीसवीं सदी में व्याप्त हिंसा और आतंक को ही चित्रित करता रहा ।

जिन पाठकों ने तारकोवोस्की की फिल्म ‘सेक्रिफाइस’ देखी हो वे यह जानते होंगे कि हिंसा के विरोध में बनाई गई यह एक ऐसी फिल्म थी जिसमें कोई तोप, टैंक, बम-विस्फोट या कोई युद्ध नहीं है । ‘सेक्रिफाइस’ एक बच्चे की कहानी है जिसका पिता युद्ध में मारा गया है । क्योंकि तारकोवोस्की जानते थे कि हिंसा और विध्वंस की असली कैजुअल्टी यही जेनेरशन होती है । अपने लेखन कौशल और ईमानदारी के कारण ही देवेन्द्र की यह कहानी कला के श्रेष्ठतम उपलब्धियों के क्रम में मौजूद है ।


(यह आलेख १० अप्रैल २०१० "बना रहे बनारस" के लिए लिखा गया था) 

आलेख पर आई कुछ प्रतिक्रियाएं इस प्रकार थीं :- 


शशिभूषण ने कहा…
क्षमा करो हे वत्स मैंने भी पढ़ी है.यह कहानी जिस गहरे दुख बोध में ले जाकर हमें छोड़ती है वहाँ अपनी नागरिक निरुपायता अभिषाप लगने लगती है.यही इस कहानी का संप्रेष्य और सफलता हैं.सच कहूँ तो मेरी हिम्मत ही नहीं हुई कि मैं इस कहानी को दुबारा पढ़ सकूँ.यह एक बच्चे की हत्या और उसके पिता होने की असमर्थता का महाकाव्यात्मक आख्यान है.यहाँ आख्यान कहने का विशेष अभिप्राय है.मुझे नहीं पता कि आख्यान शब्द की व्याप्ति कितनी है पर क्षमा करो हे वत्स के संदर्भ में केवल कहानी कहना अपर्याप्त सा लगता है.अगर कहानी की कविता से तुलना करने की कोई स्वस्थ परंपरा होती जिससे मैं कुछ सीखकर और अपने विवेक का इस्तेमाल करके कुछ कह सकता तो मैं इस कहानी की तुलना निराला की कविता सरोज स्मृति से करता.अपने प्रभाव में यह एक शोकगीत की तरह है.नृशंस व्यवस्था के प्रति दुख का धिक्कार है यह कहानी.दुख जो प्रिय बेटे की हत्या से पैदा होता है और न्याय के लिए लड़ते हुए हर जगह से हारकर उसी बेटे से माफ़ी मांगने में बदल जाता है जिसकी हत्या हो चुकी है.हत्या को अंतत:मृत्यु मानकर क्षमा मांगना इस समय का भीषण संकट है जिसके जबड़े में समूची मनुष्यता आ गई है.
पता नहीं फिल्म बन जाने से कोई कहानी कितनी श्रेष्ठ प्रमाणित हो जाती है.पर ये दोनों अलग अलग विधा हैं.जब ये एक दूसरे में रूपांतरित हो ही न सकें उस अद्वितीय स्थिति की सोचें.कहीं गहरे फिल्म आयोजनी विधा है.इन दिनों इतनी ज्यादा कि फिल्म की फिल्म बन रही है.उमराव जान के रूप में रेखा और ऐश्वर्या राय को देखिए इस माध्यम की लोलुपता समझ आ जाएगी.फिल्में अक्सर सिर्फ कहानीकार की प्रसिद्धि बढ़ाती है.
अगर आपने अनवर देखी हो तो देखा होगा कहानी अंट नहीं पाई फिल्म में.प्रियवंद की भाषा और चित्रित परिवेश को दृश्य में बदल सकने लायक हिंदी सिनेमा का यह माध्यम शायद नहीं.
कुछ दिनों पहले मैंने बिमल राय की बिराज बहू देखी.अगर ऐसी फिल्म हो तो कहानीकार फिल्म की कहानी बनाना चाहेंगे.
पर आप तो कुछ खास फिल्मों के बहाने कह रहे हैं सो समीक्षा का यह अनुशासन भी सही.
सुशीला पुरी ने कहा…
'क्षमा करो हे वत्स' का संदर्भ लेकर आपने जितनी बातें कहीं वो बिल्कुल सच है । किन्तु क्या आपको नही लगता की पहले की अपेक्षा अब साहित्तिक कृतियों पर फिल्में कम बनती हैं ?
वह एक अद्भुत कहानी है…शायद उसे देवेन्द्र भाई ही लिख सकते थे…जब मैने यह उनसे कहा तो जो मुस्कान उनके चेहरे पर उभरी उसे बर्दाश्त नहीं कर पाया…एक क्षण को लगा वह पुत्र मैं हूं और सामने तलाश करता पिता खड़ा है…
Rahul ने कहा…
i will try to read this story after your appraisal
SANJEEV JHA ने कहा…
शशिभूषण जी, आप बिलकुल सही कह रहे हैं. 'सरोज स्मृति','क्षमा करो हे वत्स' या 'मोहनदास' ऐसी रचनाएँ हैं, जिनसे पता चलता है कि एक बड़ा साहित्यकार जब अपने व्यक्तिगत अनुभवों पर लिखता है तो उसका कैनवास कितना व्यापक हो सकता है. उनकी चिंता लाखों-करोड़ो पाठकों से कितनी गहराई से जुडती है. कहानी के इस पक्ष पर भी लिखूंगा. ध्यान दिलाने का शुक्रिया. 
'
बिराज बहु' और 'अनवर' दोनों फ़िल्में मैंने देखी हैं. शरतचंद्र की कृतियों में तो नाटकीयता इतनी होती है कि कोई भी फिल्ममेकर प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता. दिलीप कुमार तो कहते ही थे कि शरत बाबु के पात्र नाटकीय परिस्थितियों से इतने घिरे होते हैं कि फिल्म बनाने कि सम्भावना दोगुनी बढ़ जाती है. एक और बात हैं शशि भाई, स्त्री-पुरुष संबंधों संबंधों या जिसे हम मानवीय संबंधों पर आधारित कहानी कहते हैं, वो भी द्वंद्वों की चरम सीमा के साथ. मानवीय संबंधों की एपिकैलिटी. वो तो अद्भुत है. प्रियम्बद की जहाँ तक बात है, उसपर भी मैं आपसे सहमत हूँ. 'अनवर' तो गड़बड़ थी ही, 'खरगोस' को जिसने adapt किया है, वो तो भयावह है. जिनती अच्छी कहानी है उतना ही ख़राब adaptation. ओसियान फिल्म फेस्टिवल इसी बार मैंने ये फिल्म देखी. बहुत ही प्लास्टिक फिल्म है, इतना की कहूँगा. आपकी प्रतिक्रिया बहुत अच्छी लगी. सुझावों का इंतज़ार रहेगा. आभार.
SANJEEV JHA ने कहा…
सुशीला जी, आप सही कह रही हैं. कभी-कभी मैं सोचता हूँ कि पहले साहित्यकारों और फिल्मकारों के बीच जो सम्बन्ध हुआ करते थे, अब वो भी तो नहीं. कहा जाता है कि जैसे जैसे फिल्म निर्माण में भू-स्वामियों, ड्रग्स-डीलरों, अंडरवर्ल्ड के लोगों और ऐसे कितने 
हिस्ट्रीशिटरों का पैसा लगने लगा, साहित्यकारों और फिल्मकारों के बीच दूरी बढती चली गई. साहित्य और सिनेमा एक दुसरे से कटते चले गए. ऐसी ही चिंताओं और सरोकारों पर मनोहर श्याम जोशी कि बड़ी अच्छी किताब है - हमजाद. हिंदी के लेखकों में थोड़ा काम्प्लेक्स भी है, फिल्म के मामले में. पहले भी था और आज भी है. लेकिन ऐसा भी नहीं कि पहले साहित्यिक कृतिओं पर खूब फ़िल्में बनती थीं.
यह ही देखना होगा कि आजकल हिन्दी की कहानियों/उपन्यासों को फिल्म जगत में कितने लोग पढ़ते हैं?
Saurabh Bajpai ने कहा…
असहमति के साथ लिखना आसान होता है पर जहाँ सहमति के बिंदु ही ज्यादा हो वहा टिप्पणी करना बहुत कठिन. कम से कम मुझे तो यही महसूस हो रहा है संजीव के आलेख पर कमेन्ट करते हुए. कहानी adaptation के लिए एकदम मुफीद है, बेहद नाटकीय और गजब संवेदनशीलता से भरी हुई. एक पिता- पुत्र के अन्तर्सम्बन्धों की तहें लपेटत्ती चलती कहानी धीरे धीरे अंशुल को बचाने की मुहीम के सरोकार के साथ पाठक को गूंथ देती है. देवेन्द्रजी की भाषा में एक बहाव, एक force हमेशा महसूस होता है, हर कहानी में. चूंकि ये कहानी एक बच्चे के अपहरण से और उसे बचाने के लिए एक पिता की मुहिम से जुडी है, तो वह force भावुक बनाते हुए उस पिता के मनोजगत से एकाकार करा देती है. सरसों के खेत में अंशुल की लाश के टुकड़े अपने टुकड़े मालूम देते हैं. एक लालची सभ्यता की शिकार एक मासूम जान- अंशुल- के टुकड़े और व्यवस्था की दुर्व्यवस्थाओं से हारे एक पिता के टुकड़े. एक कहानी किन स्तरों पर अपने पाठक के मनोभावों को उभार और झकझोर सकती है, ये इस कहानी में देखा जा सकता है. 
संजीव सिनेमा के पारखी हैं, उनकी नजर जाने कबसे इस कहानी पर है. वे इसकी adaptation की संभावनाओ से बहुत दिनों से अभिभूत हैं. हमे तो लगता है आज नहीं तो कल वे ही इस कथा को पटकथा बनाकर न्याय करेंगे. आमीन!
SANJEEV JHA ने कहा…
बिल्कुल अभी अभी अपने एक अजीज़ अभिषेक का स्क्रैप देखा. अभिषेक इसी महीने अपनी 10वीं की परीक्षा देकर दिल्ली आया है और FITJEE में पढ़ाई कर रहा है. उसने यह लेख पढने के बाद जो स्क्रैप भेजा है, उसे उसी रूप में यहाँ पेस्ट कर रहा हूँ – 
i read ur latest post today. i agree with u that a film should be inspired of some ideas, but not be copied throughout. i have seen 'rang de basanti' but not 'dev d'. however i took ur vies very well. i know very well about van gaugh. he spent his whole life in scarcity. he was master of perfection, i say. you introduced him in ur post i liked it. keep writing in the same way. what's the new topic on which u r going to qoute. pls explore some time for me. i be free on sat, sun,mon. take care. bye.
@
बहुत अच्छा लगा अभिषेक. ढेरों प्यार और शुभकामनायें. जल्दी ही मिलेंगे. 

@
सौरभ भाई, शुक्रिया आपका. लेखकों एक साथ सबसे बड़ा न्याय उसका सुधि पाठक ही करता है. आप सबों कि प्रतिक्रियाओं से हर बार यह बात साबित हो रही है. यह कहानी निश्चित तौर पर मेरी पसंदीदा कहानियों में से है. एक बात और कहना चाहूँगा, बचपन में मैं भी एक बार अपने शहर मोतिहारी में खो गया था. तब काफी छोटा था. दो दिन बाद किसी सज्जन ने बड़ी मुश्किल से घर तक पहुचाया. लेकिन संयोग देखिये कि अपने गुमशुदा बच्चे कि तलाश में कोई पिता किन मानसिक स्थितियों से गुजरता है, वर्षों बाद मैंने इस कहानी के माध्यम से जाना. आभार.





No comments: