Wednesday, September 30, 2009

एक और कविता- संजीव




अब जब कि
स्वप्न बनकर
लौट आया है वो समय और वो स्मृतियाँ
मैं देखता हूँ
अपने कमरे कि खिड़की के पार
उस जीवित तालाब को
जिसके किनारे बैठकर
बचपन में लगाता था बंसी
और जब वह मछली के लाल गलफड़े को
भेद कर हो जाती थी पार
क्या अर्थ देता था आंटे का वह लेई
कैसे तन जाता था रेशम का धागा
और दौड़ जाती थी छटपटाहट
उस धागे पर

मछलियाँ कभी चीखा नहीं करती
सिर्फ छटपटाती हैं
ज़मीन पर पड़ी हुईं
आखिरी साँस तक उछलती और तड़पती
और तब पानी कि एक-एक बूंद खोलती हैं अर्थ
आंटे के उस गीले दाने का
खून से कहीं ज्यादा

ठीक उसी समय
याद आती है माँ कि पढाई वह कविता
लेकिन अगली बार
जब बैठता हूँ बंसी लेकर
और जब तन जाता है रेशम का धागा
दौड़ जाती है छटपटाहट उस धागे पर
नहीं सुनाई देती कोई चीख
छटपटाती है ज़मीन पर पड़ी हुई
मेरी ही अपनी माँ

4 comments:

satya.... said...

काफी मर्म है इस कविता में ....अच्छा लिखते हो ..कविता चोरी कर लूँगा ... हा हा हा हा हा हा हा ..

Sulabh Jaiswal "सुलभ" said...

स्वागत है आपका, निरंतर सक्रिय लेखन से हिन्दी ब्लॉग्गिंग को समृद्ध करें
धन्यवाद!

Chandan Kumar Jha said...

बहुत ही भावुक रचना । लिखते रहे । स्वागत है ।

कृप्या वर्ड वेरीफिकेशन हटा दे, टिप्पणी करने में सुविधा होती है ।



गुलमोहर का फूल

Unknown said...

bahut barhia...aapka swagat hai... isi tarah likhte rahiye..

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