किसी तारीख या किसी दिवस के बहाने ही सही लेकिन आखिरकार जब हम झूठ की राजनीति और ठगी की संस्कृति के इस वीभत्स और दारुण समय में पीछे की ओर लौटते हैं तो हमे जिस व्यक्ति की बेइंतहा याद आती है, निश्चय ही वे महात्मा गाँधी हैं। वे सचमुच में तथाकथित आधुनिक सभ्यता की विभत्सता और उससे निकलने वाले विध्वंस को चुनौती देने वाले पहले व्यक्ति थे। तो इस तथाकथित आधुनिकता में हम और हमारा समय कहाँ से कहाँ पहुच गया, इसी पर मैंने एक छोटी और अपनी पहली कविता लिखी है, और मैं कही गहरे यह महसूस करता हूँ कि समय की विद्रूपताओं और संक्रांतियों के दौर में कवितायें अपना अर्थ खोज लेती हैं और तब हमारा पूरा युग कविताओं में बोलने लगता है। हमारे हिंदी साहित्य में तो कई ऐसे लेखक हुए हैं जो एक साथ कवि और कथाकर दोनों हुए। ऐसे साहित्यकारों की रचनाएँ हमारे प्रेरणा के अक्षय श्रोत हैं। तो मेरा यह पहला प्रयास-
हमारा समय
एक कलर पेंटिंग है
जिसके एक हिस्से में
शेर की खाल पर बैठी कुछ औरते
नंगी होकर बेच रही हैं
कंडोम
और दूसरे हिस्से में
कंडोम के ही भीतर
अपनी साँसे भर रहा
एक बच्चा है
आउट ऑफ़ फोकस
एक कलर पेंटिंग है
जिसके एक हिस्से में
शेर की खाल पर बैठी कुछ औरते
नंगी होकर बेच रही हैं
कंडोम
और दूसरे हिस्से में
कंडोम के ही भीतर
अपनी साँसे भर रहा
एक बच्चा है
आउट ऑफ़ फोकस
2 comments:
अच्छी शुरूआत है। कविता लेखन में प्रथम प्रयास सराहनीय है। ब्लाग के लिए शुभकामनाएं।
nakaratmak hai...magar saakratmak ki oor hai......
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